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कृषिसामान्य ज्ञान

दण्डकारण्य कृषि संदेश – कम समय में ज्यादा मुनाफा देने वाली फसल  गाजर जानिए कैसे करे गाजर की खेती ..

संवाददाता- दीपक गोटा

 

कम समय से ज्यादा मुनाफा देने वाली फसल गाजर जो दूसरे फसलों की तुलना में कम मात्रा और समय के बावजूद किसानों की ज्यादा मुनाफा देता है 

1(गाजर की फसल का परिचय)

गाजर एक द्विवार्षिक सब्जी है जो अम्बेलिफेरा परिवार से संबंधित है – और विटामिन A का एक प्रमुख स्रोत है इसकी खेती मुख्य रूप से भारत के हरियाणा-आंध्र प्रदेश- कर्नाटक- पंजाब और उत्तर प्रदेश राज्यों में होती है- यह मिट्टी के अंदर शंक्वाकार जड़ के रूप में विकसित होती है- जो नारंगी- सफेद- पीली-लाल या बैंगनी रंग की हो सकती है यह फसल आसानी से उगाई जा सकती है और इसे सीधे बीज से बोना सबसे अच्छा होता है

 

गाजर की खेती के लिए सबसे अच्छा समय सितंबर से नवंबर और अक्टूबर में बोई गई गाजर की फसल की पैदावार और गुणवत्ता दोनों सबसे अच्छी मानी जाती हैं

मुख्य बुवाई का समय- 

सितंबर से नवंबर सबसे उपयुक्त है, जिसमें अक्टूबर को सर्वोत्तम माना जाता है

 

गाजर की फसल कैसे करें-

गाजर की फसल के लिए सबसे पहले ढीली और उपजाऊ मिट्टी तैयार करें और सही समय पर बीज बोएं

 

1.(बुवाई की तैयारी) 

मिट्टी-

गाजर के लिए ढीली, उपजाऊ और अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी सबसे अच्छी होती है- भारी मिट्टी में मेड़ बनाकर बोना बेहतर होता है, जबकि रेतीली मिट्टी में समतल क्यारियां बना सकते हैं

बीज

उच्च गुणवत्ता वाले बीज चुनें। बीजों को 12-24 घंटे पानी में भिगोकर, फिर छाया में सुखाकर बोना फायदेमंद होता है, इससे वे जल्दी उगते हैं

समय

गाजर की बुवाई के लिए सबसे अच्छा समय पतझड़ के अंत या वसंत की शुरुआत में होता है- जब मौसम ठंडा हो

2 (बुवाई की प्रक्रिया) 

दूरी

कतार से कतार की दूरी 30-40 सेमी और पौधे से पौधे की दूरी 8-10 सेमी रखें।

गहराई – बीजों को 1 से 1.5 सेमी गहराई पर बोएं

तरीका– रेतीली मिट्टी में रेत में मिलाकर बोने से बीजों का वितरण समान होता है जिससे बीज कम लगता है और समान दूरी बनी रहती है

सिंचाई

बुवाई के तुरंत बाद पहली सिंचाई करें और अंकुरण तक मिट्टी में नमी बनाए रखें

फसल की देखभाल

सिंचाई

गाजर को पर्याप्त नमी की आवश्यकता होती है- शुष्क मौसम में हर पाँच दिन में लगभग 0.75 इंच (19 मिमी) पानी दें रेतीली मिट्टी में बार-बार हल्का पानी देना चाहिए

नियंत्रण – बीज उगने के बाद खरपतवार नियंत्रण करना महत्वपूर्ण है ताकि गाजर की जड़ों के विकास में बाधा न आए

पतला करना– अंकुरण के 2-3 सप्ताह बाद, जब पौधे 5-10 सेमी लंबे हो जाएं- तो अतिरिक्त पौधों को निकाल दें- इससे बचे हुए पौधों को बढ़ने के लिए पर्याप्त जगह मिलेगी

खाद– रोपाई के बाद खरपतवारों को रोकने और नमी बनाए रखने के लिए मल्चिंग करें- बाद में स्कॉट्स ऑस्मोकॉट प्लस ऑर्गेनिक्स ऑल पर्पस प्लांट फ़ूड और सॉइल इम्प्रूवर जैसे जैविक उर्वरक का हल्का छिड़काव करें

4 (कटाई) 

समय– गाजर की कटाई आमतौर पर 60 से 85 दिनों में की जा सकती है

कटाई से पहले – कटाई से पहले हल्की सिंचाई करें इससे खुदाई आसान हो जाती है

सही समय पर कटाई – गाजर को सही समय पर खोद लें देरी करने से गाजर की जड़ें विभाजित हो सकती हैं और वे खाने योग्य नहीं रहेंगी

 

3(गाजर की फसल की विशेषताएं-

1. (वानस्पतिक पहचान)- इसका वानस्पतिक नाम Daucus carota L. है

2.(जीवन चक्र)- यह एक वार्षिक या द्विवार्षिक जड़ी-बूटी है जो पहले वर्ष अपनी जड़ बनाती है और यदि छोड़ने पर दूसरे वर्ष फूल और बीज पैदा करता है

3.(पौधे की संरचना)- इसमें पंख जैसी हरी पत्तियां होती हैं और भूमिगत शंक्वाकार- मुख्य जड़ होती है जो किस्म के आधार पर \(5\) से \(50\) सेमी तक लंबी हो सकती है

4.(मौसम और मिट्टी)- गाजर के लिए अच्छी तरह से जल निकासी वाली, मुलायम और भुरभुरी मिट्टी सबसे अच्छी होती है- जो यह ठंडे मौसम की फसल है और (75\)°F से नीचे का तापमान इसके लिए सबसे अच्छा होता है

5.(रंग)- पारंपरिक गाजर कई रंगों में आती है, जिनमें नारंगी के अलावा लाल-नारंगी, बैंगनी और सफेद भी शामिल हैं

6.(खेती की विधि)- गाजर को सीधे बीज से उगाया जाता है क्योंकि रोपाई के बाद आकार अक्सर बिगड़ जाता है

7.(बीज और अंकुरण)- बीज \(55-65\)°F तापमान पर सबसे अच्छे से अंकुरित होते हैं और इन्हें अंकुरित होने में \(14-21\) दिन लगते हैं

 

4(मुख्य गाजर फसल की बीमारियाँ) 

1.(पत्ती झुलसा रोग (Leaf Blight)

यह एक फफूंदी जनित रोग है जो अल्टरनेरिया और सर्कोस्पोरा जैसे कवकों के कारण होता है- यह गाजर के पत्तों और डंठलों को प्रभावित करता है जिससे उपज में कमी आ सकती है खासकर जब डंठल कटाई के दौरान टूट जाते हैं

2. (पाउडरी मिल्ड्यू)- यह एक फफूंदी रोग है जो पत्तियों पर सफेद पाउडर जैसी परत बना देता है

3. (बैक्टीरियल सॉफ्ट रॉट (Bacterial Soft Rot)

यह एक जीवाणु रोग है जो गाजर को मुलायम और सड़ने वाला बना देता है

4. (कैविटी स्पॉट)- यह एक फफूंदी रोग है जो जड़ों पर दरारें और घाव बनाता है

5. (नेमाटोड (Nematodes)- ये छोटे कीड़े होते हैं जो जड़ों में घुसकर नुकसान पहुंचाते हैं- जिससे जड़ें मोटी और टेढ़ी हो सकती हैं

6. (रूट डाइबैक (Root Dieback)- यह रोग जड़ों को सुखाता और सिकोड़ता है

 

5(गाजर फसल की दवाई और खाद) 

1.खाद

1-(बुवाई के समय)-

अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद (5-10 टन प्रति एकड़) के साथ रासायनिक खाद का मिश्रण डालें- प्रति एकड़ 25 किलो नाइट्रोजन (लगभग 55 किलो यूरिया) 12 किलो फास्फोरस (लगभग 75 किलो सिंगल सुपर फास्फेट) और 30 किलो पोटाश (लगभग 50 किलो म्यूरेट ऑफ पोटाश) डालें

2-(30-35 दिन बाद)-

गाजर की फसल के लगभग 30-35 दिन बाद, यूरिया और पोटाश की एक और खुराक दें जैसे 15 लीटर पानी में लगभग 18 ग्राम पोटाश और अन्य पोषक तत्व मिलाकर स्प्रे करें

 

  2.दवाई

. (बीज उपचार)- बुवाई से पहले बीज को ट्राइकोडर्मा विरिडी (4 ग्राम प्रति किलो बीज) या कार्बेंडाजिम (2 ग्राम प्रति किलो बीज) से उपचारित करें। यह जड़ और तना सड़न रोगों से बचाव करेगा

3 (रोग और कीट नियंत्रण) –

. (पत्ती धब्बा रोग)- कार्बेंडाजिम या डाइथेन एम-45 के 0.25% घोल का छिड़काव करें

. (फफूंदी)- 

बुवाई के लगभग 55-60 दिन बाद फोलियो गोल्ड (एक फंगीसाइड) और सिमोडिस (एक कीटनाशक) का मिश्रण (25 ml फोलियो गोल्ड और 25 ml सिमोडिस प्रति 15 लीटर पानी में) करें

. (खरपतवार नियंत्रण)-

खरपतवार नियंत्रण के लिए, फ्लूक्लोरोलिन (बासालिन 45 ईसी) या पेन्डीमिथालिन (स्टाम्प 30 ईसी) का छिड़काव बुवाई के 2 दिन के भीतर करें (1 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से)

.(अतिरिक्त उपाय)- यदि आप जैविक खेती कर रहे हैं तो नीम तेल का भी उपयोग कर सकते हैं

 

6 (फसल की फायदे और इंकम) 

 

गाजर की फसल से कम लागत में अच्छी आय होती है क्योंकि यह कम समय में तैयार हो जाती है और इसकी बाजार में मांग बनी रहती है इसके फायदों में पोषक तत्वों की भरपूर मात्रा-पाचन क्रिया में सुधार और हृदय रोग से बचाव शामिल है- एक हेक्टेयर में 8 से 10 टन तक उपज हो सकती है- जिससे बाजार के भाव के अनुसार लाखों का मुनाफा कमाया जा सकता है

 

1.(गाजर की फसल के फायदे)

.(स्वास्थ्य लाभ)- गाजर में बीटा-कैरोटीन अल्फ़ा-कैरोटीन और ल्यूटिन जैसे पोषक तत्व होते हैं- जो कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने और हृदय रोगों से बचाने में मदद करते हैं इसमें मौजूद फाइबर पाचन तंत्र को बेहतर बनाता है और कब्ज से बचाता है

. (पशुओं के लिए चारा) –

गाजर के पत्तों का उपयोग पशुओं के लिए हरे चारे के रूप में किया जा सकता है जिससे दोहरी आय होती है

 . (कम लागत) –

पारंपरिक फसलों की तुलना में गाजर की खेती में कम लागत आती है- क्योंकि इसमें उर्वरक और कीटनाशकों का उपयोग कम होता है

. (फसल की कम अवधि)- गाजर की फसल 70 से 90 दिनों में तैयार हो जाती है जिससे किसान जल्दी मुनाफा कमा सकते हैं

. (उच्च मांग)- गाजर का उपयोग सब्जी के साथ-साथ जूस में भी होता है- इसलिए इसकी बाजार में मांग हमेशा रहती है

 

2.(गाजर की खेती से अनुमानित आय) 

. (प्रति एकड़ आय)- उचित प्रबंधन के साथ एक एकड़ गाजर की खेती से 4 महीने में लगभग ₹1.4 लाख तक का शुद्ध लाभ कमाया जाता है

(प्रति हेक्टेयर आय)-एक हेक्टेयर से 8 से 10 टन (80 से 100 क्विंटल) उपज मिल सकती है अगर बाजार में गाजर ₹30 से ₹50 प्रति किलो बिकती है- तो एक हेक्टेयर में लाखों का मुनाफा होता है

. (उदाहरण)-कुछ किसान 2 बीघे से (लगभग 0.4 एकड़) जमीन में गाजर की खेती करके ₹70,000 से ₹80,000 तक कमा सकते हैं- जबकि एक बीघे की लागत ₹5,000-₹6,000 आती है

 

7 (गाजर फसलों में होने वाले नुकसान) 

 

गाजर की फसल को कई तरह के नुकसान हो सकते हैं जो मुख्य रूप से कीटों, बीमारियों और खरपतवार के कारण होते हैं

 

1.(कीटों द्वारा नुकसान) 

. (गाजर की जड़ मक्खी (Carrot Rust Fly)- यह गाजर के सबसे गंभीर कीटों में से एक है- इसके लार्वा जड़ों में सुरंगें बनाते हैं जिससे जड़ें खराब हो जाती हैं और विपणन योग्य नहीं रहतीं

. (वाइरवर्म (Wireworms) और गाजर का घुन (Carrot Weevil)- ये मिट्टी में रहने वाले कीट हैं जो जड़ों में छेद कर देते हैं जिससे उपज की गुणवत्ता पर सीधा और गंभीर असर पड़ता है

. (सूत्रकृमि (Nematodes)- ये जड़ों को विकृत या कांटेदार बना देते हैं- जिससे उपज में भारी नुकसान होता है

. (एफिड्स (Aphids)- ये पौधे का रस चूसते हैं और वायरस फैला सकते हैं

 

 2 बीमारियों द्वारा नुकसान

. (पत्ती झुलसा रोग (Leaf Blight)- यह एक फंगल या बैक्टीरियल रोग हो सकता है (जैसे अल्टरनेरिया या सर्कोस्पोरा लीफ ब्लाइट)- इससे पत्तियां पीली पड़ जाती हैं, भंगुर हो जाती हैं और अंतत- मर जाती हैं जिससे प्रकाश संश्लेषण और उपज प्रभावित होती है

. (जीवाणु मृदु सड़न (Bacterial Soft Rot)-

इससे गाजर की जड़ों पर नरम पानीदार धब्बे पड़ जाते हैं- जो बाद में सड़ जाते और यह अक्सर कटाई के दौरान हुई यांत्रिक क्षति के माध्यम से फैलता है

 

(सफेद फफूंद (White Mold) या स्क्लेरोटिनिया रोट (Sclerotinia Rot)- यह रोग सफेद फफूंद के रूप में दिखाई देता है और गाजर को सड़ा देता है

 

3.(खरपतवार द्वारा नुकसान) 

गाजर घास (Parthenium grass)- यह एक आक्रामक खरपतवार है जो फसल के साथ पोषक तत्वों और स्थान के लिए प्रतिस्पर्धा करता है- जिससे उपज में 40 से 80 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है यह मनुष्यों में एलर्जी का कारण भी बनता है

 

4.(अन्य पर्यावरणीय कारक) 

. (खराब जल निकासी)- गाजर को अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी की आवश्यकता होती है- खराब जल निकासी से जड़ सड़न जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है

. (यांत्रिक क्षति)- कटाई के दौरान यांत्रिक क्षति से जड़ों में रोगजनक कवक और बैक्टीरिया आसानी से प्रवेश कर सकते हैं

इन नुकसानों से बचने के लिए उचित फसल चक्रण-कीट प्रतिरोधी किस्मों का चयन और समय पर नियंत्रण के उपाय (जैसे फफूंदनाशक या कीटनाशकों का प्रयोग) आवश्यक हैं

Bindesh Patra

युवा वहीं होता हैं, जिसके हाथों में शक्ति पैरों में गति, हृदय में ऊर्जा और आंखों में सपने होते हैं।

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