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कला और संस्कृति

CG: बस्तर की लोक संस्कृति अक्ती तिहार इतना प्रसिद्ध क्यों है आम के साथ और भी फल और पेड़ों का होता है पूजा अर्चना

 

 

बस्तर की लोकसंस्कृति, अबूझमाड़ की सौंधी माटी की खुशबु, निबरा , माड़ीन नदी की कल कल प्रवाहित नदियाँ, आम के पेड़ो में लदा गुच्छे दार आम , जंगल की चिरौंजी की झंकार, सुवा और रेला गीतों में  प्रकृति का ज्ञान, हांदावाड़ा की झर झर बहती विशाल झरना, हल्बा आदिवासीयो का कलसा पानी करते ईस्ट देवी देवताओं का धन्यवाद  करके कहते है ।

“तेरा तुझको अर्पण कर दु क्या लागे है मेरा”

अक्ती तिहार में मुख्य रूप से पूजे जाने वाले फल और वृक्षों में शामिल आम, चिरौंजी, महुआ , सेहरा, बेहड़ा, पीपल, बरगत, कुड़ई, सरई से  बस्तर की अनुपम पहचान पुरे संसार में है।

अक्ति तिहार बस्तर की लोक त्यौहार में से एक है, अक्ति तिहार को अक्षय तृतीया भी कहा जाता है, अक्षय अर्थात अजर अमर कभी खत्म ना होने वाला पवित्र यह एक ऐसा शुभ दिन  है उस दिन हर कार्य पूर्ण और सफल होता है। बैशाख मास शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाया जाने वाला यह पर्व अपने आप में अनुपम और पवित्र है।

 

चुकि भारत कृषि प्रधान देश है, कृषि जीवनस्य अधारम और कृषि ही जीवन का आधार भी, कृषि जन जीवन पर ही इंगित बस्तर की तीज त्यौहार रहती है चाहे वो तीजा पोरा हो या हरेली। अक्ति तिहार बस्तर का कृषि नववर्ष है, इस दिन से ही कृषि के नये कार्य आरंभ होते है अपितु अक्षय तृतीया के दिन हर कार्य सफल होने के कारण भी बस्तर का नववर्ष भी माना गया है,

Bindesh Patra

युवा वहीं होता हैं, जिसके हाथों में शक्ति पैरों में गति, हृदय में ऊर्जा और आंखों में सपने होते हैं।

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