
सारंडा के जंगल में फिर गूंजी गोलियां, मुठभेड़ में कोबरा के पांच जवान घायल, माओवादियों को भी भारी नुकसान
ओडिशा और झारखंड की सीमा से लगे सारंडा के घने जंगल एक बार फिर हिंसा की आवाज से दहल उठे। लंबे समय से शांत दिख रहे इस क्षेत्र में बुधवार को सुरक्षाबलों और माओवादियों के बीच हुई भीषण मुठभेड़ ने हालात की गंभीरता को उजागर कर दिया। इस मुठभेड़ में सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन के पांच जवान घायल हो गए, वहीं सुरक्षा सूत्रों के अनुसार माओवादियों को भी इस कार्रवाई में भारी नुकसान पहुंचा है।
मिली जानकारी के अनुसार झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले के अंतर्गत आने वाले सारंडा जंगल क्षेत्र में सुरक्षाबलों द्वारा एक संयुक्त सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा था। इस ऑपरेशन में सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन, झारखंड जगुआर और जिला पुलिस की टीम शामिल थी। सुरक्षाबलों को पहले से ही इस इलाके में माओवादियों की मौजूदगी की सूचना मिली थी, जिसके आधार पर यह अभियान शुरू किया गया।
बताया जा रहा है कि जैसे ही सुरक्षाबलों की टीम जंगल के भीतर आगे बढ़ी, पहले से घात लगाए बैठे माओवादियों ने अचानक फायरिंग शुरू कर दी। शुरुआती हमला इतना तीव्र था कि कुछ देर के लिए स्थिति तनावपूर्ण हो गई। हालांकि, सुरक्षाबलों ने तत्परता दिखाते हुए मोर्चा संभाला और जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी। इसके बाद दोनों ओर से लंबे समय तक गोलीबारी होती रही, जिससे पूरा इलाका गोलियों की गूंज से थर्रा उठा।
इस मुठभेड़ में कोबरा 205 बटालियन के इंस्पेक्टर सत्य प्रकाश सहित शैलेश कुमार दुबे, उत्तम सेनापति, जितेंद्र कुमार रॉय और प्रेम कुमार घायल हो गए। घायल जवानों को तत्काल सुरक्षित स्थान पर ले जाकर प्राथमिक उपचार दिया गया, जिसके बाद उन्हें बेहतर इलाज के लिए अस्पताल भेजा गया। अधिकारियों के अनुसार सभी जवान खतरे से बाहर बताए जा रहे हैं, लेकिन कुछ को गंभीर चोटें आई हैं।
सुरक्षाबलों के अधिकारियों का कहना है कि मुठभेड़ के दौरान माओवादियों को भी काफी नुकसान पहुंचा है। हालांकि, अभी तक आधिकारिक तौर पर किसी माओवादी के मारे जाने की पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन घटनास्थल से खून के निशान और अन्य सामग्रियां मिलने से यह अंदाजा लगाया जा रहा है कि कई माओवादी घायल हुए हैं या उन्हें भारी क्षति पहुंची है।
सारंडा का जंगल क्षेत्र लंबे समय से माओवादी गतिविधियों का गढ़ माना जाता रहा है। यहां का घना वन क्षेत्र और कठिन भौगोलिक परिस्थितियां माओवादियों को छिपने और रणनीतिक गतिविधियों को अंजाम देने में मदद करती हैं। यही कारण है कि सुरक्षाबलों के लिए इस इलाके में ऑपरेशन चलाना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है।
हाल के वर्षों में सुरक्षाबलों ने लगातार अभियान चलाकर इस क्षेत्र में माओवादी प्रभाव को कमजोर करने की कोशिश की है। कई बड़े ऑपरेशन के जरिए माओवादियों के ठिकानों को ध्वस्त किया गया है और उनके नेटवर्क को तोड़ने का प्रयास किया गया है। बावजूद इसके, समय-समय पर इस तरह की मुठभेड़ें यह संकेत देती हैं कि माओवादी अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं और अवसर मिलने पर वे सक्रिय हो जाते हैं।
इस ताजा मुठभेड़ के बाद सुरक्षा एजेंसियां और सतर्क हो गई हैं। पूरे इलाके में अतिरिक्त बल तैनात कर दिया गया है और सर्च ऑपरेशन को और तेज कर दिया गया है। अधिकारियों का कहना है कि जब तक क्षेत्र पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो जाता, तब तक अभियान जारी रहेगा।
स्थानीय स्तर पर भी इस घटना का असर देखने को मिला है। आसपास के गांवों में दहशत का माहौल है, हालांकि सुरक्षाबलों ने ग्रामीणों को भरोसा दिलाया है कि उनकी सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। लोगों से अपील की गई है कि वे किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना तुरंत पुलिस को दें।
इस तरह की मुठभेड़ें यह दर्शाती हैं कि माओवादी अभी भी अपने प्रभाव को बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन सुरक्षाबलों की बढ़ती सक्रियता उनके लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। लगातार दबाव के कारण माओवादी अब छोटे-छोटे समूहों में बंटकर हमले कर रहे हैं, जिससे वे सुरक्षाबलों को नुकसान पहुंचा सकें।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शांति बहाली के लिए सुरक्षा और विकास दोनों पहलुओं पर समान रूप से काम करने की जरूरत है। जहां एक ओर सुरक्षाबल अपने अभियान के जरिए माओवादियों को कमजोर कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार को इन क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं और रोजगार के अवसरों को बढ़ाने पर भी ध्यान देना होगा।
कुल मिलाकर सारंडा के जंगल में हुई यह मुठभेड़ न केवल सुरक्षा व्यवस्था की चुनौती को सामने लाती है, बल्कि यह भी बताती है कि नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई अभी जारी है। घायल जवानों के जल्द स्वस्थ होने की कामना के साथ अब सभी की नजरें सुरक्षाबलों के अगले कदम और इस अभियान के परिणाम पर टिकी हुई हैं।




