Chhattisgarh: बस्तर दशहरा की सबसे खास परंपरा महाअष्टमी पर निशा जात्रा की रस्म जिसे स्वयं निभाते है राजपरिवार 1301 ई. से चली आ रही है ये परंपरा

बस्तर दशहरा के सबसे खास परंपरा महाअष्टमी पर निशा जात्रा की रस्म जिसे स्वयं निभाते है राजपरिवार 1301 ई. से चली आ रही है ये परंपरा
12 गांवों से राउत माता के लिए 12 पात्रों में भोग अर्पित कर सदियों पुरानी परंपरा निभाई गई। निशा जात्रा में श्रद्धालु जुटे और राज्य की रक्षा हेतु भी अनुष्ठान किया गया।
बस्तर में तांत्रिक पूजा के जरिए देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए राजा कमलचंद भंजदेव ने देर रात निशा जात्रा की रस्म पूरी की ।इस दौरान माता को प्रसन्न करने के लिए भोग लगाने के साथ बकरों की भी बलि दी जाती है।
बस्तर दशहरा की इस अनूठी रस्म के जरिए बस्तर को बुरी प्रेत आत्माओं से बचाने के लिए किया जाता है अष्टमी और नवमी तिथि के बीच देर रात को यह रस्म निभाने की परंपरा सदियों पुरानी है ।
इस रस्म के तहत देर रात को राजा कमलचंद भंजदेव के साथ बस्तर राज परिवार के प्रमुख सदस्य मां दंतेश्वरी मंदिर के पुजारी एवं अन्य लोग पैदल चलकर अनुपमा चौक स्थित गुड़ी (मंदिर ) पहुंचे तथा मंदिर में तांत्रिक पूजा-अर्चना कर बस्तर के लोगों की खुशहाली और बस्तर को नकारात्मक शक्तियों से बचाने के लिए प्राथना किया गया इस दौरान माता को प्रसन्न करने के लिए भोग लगाने के साथ बकरों की बलि दी गई ।
बस्तर की मान्यता है निशा जात्रा को रश्म राज्य और प्रजा को बुरी आत्माओं और नकारात्मक ऊर्जा से बचने के लिए किया जाता है। यह अनुष्ठान राज्य की सुख समृद्धि और शांति के लिए भी बहुत थी महत्वपूर्ण माना जाता है । बस्तर दशहरा में निभाने वाला यह रस्म 1301 ई. शुरू किया गया था जो कि बस्तर दशहरा के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है।




