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Chhattisgarh: बस्तर की अनूठी लोक परंपरा – जोगी बिठाई हल्बा जनजाति के लिए है खास 

बस्तर की अनूठी लोक परंपरा – जोगी बिठाई हल्बा जनजाति के लिए है खास

बस्तर में दशहरा, जो पूरे 75 दिनों तक चलने वाला भारत का सबसे लंबा उत्सव है, माँ दंतेश्वरी की आराधना का पर्व है, और इसकी सबसे अनूठी परंपराओं में से एक है जोगी बिठाई.

 

इस परंपरा में बस्तर के हल्बा जनजाति से चुने गए जोगी को देव परिसर में “बिठाया” जाता है.

 

यह जोगी चुने व्यक्त को पूरे नवरात्रि काल तक उपवास, साधना और मौन व्रत का पालन करना पड़ता है ।

जोगी को बिठाने की परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि समूह-आस्था और सामाजिक एकजुटता का प्रतीक है मन जाता है ।

 

बस्तर दशहरे में जोगी बिठाई अत्यधिक महत्वपूर्ण माना जाता है, यह नवरात्रि की साधना, जनजातीय परंपरा और सनातन शक्ति-आराधना का अद्वितीय संगम है । जोगी बिठाई’ का अर्थ है जोगी का बैठना, जो तपस्या करने वाले योगी को संदर्भित करता है. इस रस्म का मुख्य उद्देश्य दशहरा उत्सव को शांतिपूर्ण और बिना किसी बाधा के संपन्न कराना है.। यह रस्म दशहरा पर्व से पहले, नवरात्र के पहले दिन से शुरू होती है और विजय दशमी तक चलती है।जोगी बनने वाला युवक सफेद वस्त्र धारण करता है, देवी-देवताओं का आशीर्वाद लेता है और फिर सिरहासार भवन स्थित एक स्थान पर कुंड में बैठकर निर्जल उपवास करता है।ऐसी मान्यता है कि जोगी के तप से देवी प्रसन्न होती हैं और दशहरा पर्व बिना किसी बाधा के संपन्न होता है। यह परंपरा तब से चली आ रही है जब दशहरे के दौरान एक हल्बा जाति का युवक जगदलपुर राजमहल के पास तपस्या के लिए बैठ गया था, और महाराजा ने उसके लिए सिरहासार भवन का निर्माण करवाया था.

विशेष रूप से हलबा जाति का एक युवक ही इस रस्म में जोगी बनता है।

 

Bindesh Patra

युवा वहीं होता हैं, जिसके हाथों में शक्ति पैरों में गति, हृदय में ऊर्जा और आंखों में सपने होते हैं।

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