
भूतपूर्व छात्र-छात्राओं का भव्य मिलन सम्मेलन: नारायणपुर में शासकीय बालक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय की यादगार पहल
नारायणपुर – नक्सल प्रभावित नारायणपुर जिले के शासकीय बालक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में आज का दिन बेहद खास और ऐतिहासिक रहा। वर्ष 1958 में स्थापित इस विद्यालय में पहली बार भूतपूर्व छात्र-छात्राओं का एक भव्य सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें 1958 से लेकर 2024 तक के विभिन्न बैचों के सैकड़ों पूर्व छात्र-छात्राएं शामिल हुए। इस भावनात्मक मिलन समारोह में वे शिक्षक भी मौजूद रहे, जिन्होंने इन विद्यार्थियों को पढ़ाया था और जिनकी छाया में कई सफल व्यक्तित्व आज समाज में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। सम्मेलन की शुरुआत ठीक उसी अंदाज़ में हुई जैसे स्कूल के दिनों में होती थी – ध्वजारोहण, राष्ट्रगान और भारत माता के जयकारों के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। छात्रों और शिक्षकों ने एक बार फिर अपने बचपन की उन यादों को जीया, जिसे समय ने भले ही धुंधला कर दिया हो, लेकिन दिलों से मिटा नहीं सका। कार्यक्रम का सबसे भावुक पल वह था, जब 25 से 40 साल बाद पुराने सहपाठी एक-दूसरे से गले मिले। उन चेहरों पर वो ही निश्छल मुस्कान थी, जो उन्होंने स्कूल के दिनों में साझा की थी। किसी ने अपने पुराने दोस्त को देखकर आंखें नम कीं, तो किसी ने शिक्षक के चरणों में झुककर आशीर्वाद लिया। इस आत्मीय मिलन में एक बार फिर वह संबंध जीवंत हो उठे, जो समय, स्थान और परिस्थितियों के कारण कहीं छूट गए थे। सम्मेलन में छत्तीसगढ़ के अलग-अलग जिलों के साथ-साथ दिल्ली, मध्यप्रदेश और विदेशों से भी पूर्व छात्र पहुंचे। कई ऐसे छात्र भी आए जो अब कलेक्टर, डॉक्टर, शिक्षक, पुलिस अधिकारी, वन अधिकारी और अन्य प्रतिष्ठित पदों पर कार्यरत हैं। उन्होंने न केवल अपनी उपलब्धियों को साझा किया, बल्कि स्कूल के उन संघर्षपूर्ण दिनों की यादें भी सुनाईं, जो उन्हें यहां तक लाईं। उन्होंने वर्तमान छात्रों को भी संबोधित करते हुए कहा कि अगर ठान लिया जाए तो किसी भी हालात में सफलता हासिल की जा सकती है। कार्यक्रम की एक रोचक झलक तब देखने को मिली, जब एक पूर्व शिक्षक ने अपने पूर्व छात्र से सवाल पूछा और छात्र ने उसका उत्तर देकर पुरस्कार प्राप्त किया। यह दृश्य देखकर सभी के चेहरे खिल उठे और पूरा माहौल तालियों से गूंज उठा। यह आयोजन न केवल एक पुनर्मिलन था, बल्कि यह शिक्षा और संस्कार के रिश्ते को फिर से जीवित करने का एक माध्यम भी बना।
विद्यालय की आयोजन समिति के सुदीप झा ने बताया कि स्कूल के प्राचार्य के सहयोग से इस सम्मेलन को आयोजित किया गया, जिसका मुख्य उद्देश्य भूतपूर्व छात्रों को एक मंच पर लाना, वर्षों बाद शिक्षकों और छात्रों के पुनर्मिलन को संभव बनाना और वर्तमान विद्यार्थियों को इन सफल पूर्व छात्रों के अनुभवों से प्रेरित करना था। उन्होंने कहा कि यह सम्मेलन केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक पीढ़ी को दूसरी पीढ़ी से जोड़ने वाला पुल है।
सम्मेलन में शामिल शिक्षकों की आंखों में गर्व और संतोष स्पष्ट झलक रहा था। उन्होंने कहा कि भले ही समय के साथ बहुत कुछ बदल गया हो, लेकिन उनके विद्यार्थियों का सम्मान और स्नेह आज भी वैसा ही है। एक शिक्षक ने भावुक होकर कहा, “आज जब देखता हूं कि मेरे पढ़ाए हुए बच्चे जीवन में इतने ऊंचे पदों पर हैं और आज भी हमें उतना ही मान देते हैं, तो लगता है यही हमारी असली गुरु दक्षिणा है।”
सम्मेलन के अंत में सभी ने मिलकर स्कूल प्रांगण में वृक्षारोपण किया, जिसमें ‘यादों का वृक्ष’ नाम देकर एक विशेष पौधा भी लगाया गया, जो इस दिन की स्मृति को हमेशा जीवित रखेगा। यह सम्मेलन न केवल यादों का सागर था, बल्कि यह भविष्य की प्रेरणा का स्रोत भी बन गया।
पुराने छात्र-छात्राओं ने यह साबित कर दिया कि चाहे दुनिया कहीं भी ले जाए, दिल हमेशा उसी जगह लौटता है, जहां से सफर शुरू हुआ था – अपने स्कूल।




