header ads
अधिकारपर्यावरणराष्ट्रीय

भगवान बिरसा मुंडा का जीवन दर्शन उल्गुलान का उद्घोष है । 

 भगवान बिरसा मुंडा का जीवन दर्शन उल्गुलान का उद्घोष है ।

 

 सलाहकार

इतिहास साक्षी है कि स्वतंत्रताप्रिय आदिवासी कभी किसी के अधीन नहीं रहे।जिस किसी सत्ता ने उन्हें गुलाम बनाने का प्रयास किया है,उस शासन- सत्ता को मुंह की खानी पड़ी है। शोषण,अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध स्वातंत्र्य समर में कई आदिवासी क्रांतिवीरों की गाथाओं से इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं।अपने स्वाभिमान के विरुद्ध सर्वाधिक संघर्ष आदिवासियों ने किया है।इनका संघर्ष पराधीनता से मुक्ति की आस में था। इतिहासकारों द्वारा आदिवासी विद्रोह और उनके जननायकों का समुचित सम्मान नहीं किया गया है। इनके योगदान को चंद लाईनों में समेटकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली गई है।

अपने धर्म – संस्कृति की रक्षा हेतु सर्वस्व न्यौछावर करने वाले, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद और चैतन्य महाप्रभु की तरह प्रगतिशील और सुधारवादी विचारक “धरती आबा ” आदिवासियों के भगवान बिरसा मुंडा का नाम इतिहास के पन्नों पर स्वर्णाक्षरों में अंकित है।

 

बिरसा मुंडा का जन्म एवं शिक्षा –

 

झारखंड राज्य में स्थित छोटा नागपुर का पठार प्राकृतिक और खनिज संसाधनों के लिए जाना जाता है।

छोटा नागपुर के पठार में स्थित उलीहातु गांव में 15 नवंबर 1875 को एक साधारण मुंडा आदिवासी परिवार में एक बालक का जन्म हुआ जो आगे चलकर अपने सिद्धांत और आदर्शों की बदौलत अवतारी पुरुष अथवा भगवान के नाम से प्रसिद्ध हुआ। बृहस्पतिवार को इस अवतारी बालक का जन्म होने के कारण इसका नाम रखा गया -” बिरसा”। बिरसा की माता का नाम करमी हातु व पिता का नाम सुगना मुंडा था।

साल्गा गांव में प्राथमिक शिक्षा पूर्ण करने के बाद बिरसा ने आगे की पढ़ाई के लिये जर्मन – ईसाई द्वारा संचालित चाईबासा इंग्लिश मीडियम स्कूल में दाखिला लिया।स्कूली शिक्षा के दौरान वे ब्रिटिश हुकूमत द्वारा आदिवासियों पर किये जा रहे अत्याचार को देखकर दुखी थे और मुंडा लोगों की दशा सुधारने पर चिंतन करने लगे थे।

पादरियों एवं ईसाई धर्म प्रचारकों द्वारा अपने धर्म को श्रेष्ठ व सनातन हिन्दू धर्म -दर्शन को हीन बताने पर बिरसा दुखी थे। ईसाई धर्म प्रचारकों ने वनवासियों की जीवन -शैली व धार्मिक व्यवहार का भी उपहास किया और आदिवासियों के धर्मान्तरण पर जोर देने लगे।

बिरसा जिस चाईबासा इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ रहे थे,दाखिले से पहले उनका विधिवत धर्मान्तरण कर उनका नामकरण ” डेविड बिरसा” किया गया। सन् 1886 से 1890 तक मिशनरी स्कूल में शिक्षा के दौरान अंग्रेजी भाषा के साथ ईसाई रीति-रिवाजों को भी बिरसा ने सीखा।इस स्कूल में विद्यार्थियों को वनवासी परंपराओं को दूर रखकर ईसाई संस्कृति की सीख देने की कोशिश होती थी। डेविड बिरसा ईसाई धर्म में दीक्षित थे फिर भी उनके हृदय में सनातन परंपरायें जीवित थीं। स्कूल में पादरी मुंडा आदिवासी संस्कृति व हिन्दू धर्म के विरुद्ध बोलते थे जिसका प्रतिकार करने पर बिरसा को निष्कासित कर दिया गया।

आनंद पांडे नामक व्यक्ति के संपर्क में आने पर बिरसा को वेद,पुराण, उपनिषद, महाभारत जैसे हिन्दू धर्म ग्रंथों के अध्ययन का अवसर मिला तथा 1891 मेंं ईसाईयत का त्याग कर हिन्दू धर्म में दीक्षित हुये। हिन्दू धर्म में वापसी के बाद उन्होंने मुंडा आदिवासी समाज की हालत सुधारने पर संघर्ष हेतु अपना सारा ध्यान केंद्रित किया।

 

मुंडा विद्रोह और उल्गुलान के प्रणेता – बिरसा

 

ब्रिटिश शासकों की शोषण और दमनकारी नीतियों के तहत कई मुंडाओं को प्रलोभन देकर धर्मान्तरण करवाया गया।धर्मान्तरित मुंडाओं को लगानमुक्त पट्टा दिया गया। धर्मान्तरण से इंकार करने वाले आदिवासियों पर जबरन कर का बोझ लादा गया। ब्रिटिश सरकार ने लगान की दर में उस समय वृद्धि की,जब छोटा नागपुर के पठार में आदिवासी अकाल और महामारी की मार झेल रहे थे।

बिरसा मुंडा ने धर्मान्तरित आदिवासियों को वापस मूल धर्म में लाने का कार्य प्रारंभ किया। अपने अनुयायियों के साथ गांव – गांव जाकर लोगों को जनजातीय संस्कृति में वापसी हेतु अभियान प्रारंभ किया।साथ में बिरसा समर्थक जनसमुदाय में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ क्रांति के बीज बोने का कार्य भी कर रहे थे।

1 अक्टूबर 1894 को इस युवा ने मुंडा लोगों को संगठित कर सरकार के विरुद्ध लगान माफी के लिए आंदोलन की शुरुआत की। ब्रिटिश सरकार इनके कार्य से पहले से भयभीत थी।1895 में बिरसा को गिरफ्तार कर दो साल के कारावास की सजा देकर हजारीबाग जेल में रखा गया।अंग्रेज सरकार को विश्वास था कि बिरसा की गिरफ्तारी से आंदोलन कमजोर पड़ जायेगा परन्तु इनके अनुयायियों ने गांव -गांव जाकर अकाल पीड़ितों की सेवा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आंदोलन का विस्तार जनसमुदाय में व्यापक स्तर पर हो चुका था।

 

” धरती आबा ” और भगवान की उपाधि

 

आदिवासियों के मन में क्रांति की ज्वाला धधक रही थी।छोटा नागपुर का पठार ब्रिटिश सरकार विरोधी नारों से गुंजित होने लगा था। बिरसा मुंडा आदिवासियों के बीच ” धरती आबा ” के नाम से लोकप्रिय हो चुके थे। उन्होंने अपने आपको ” धरती आबा ” कहा था। धरती आबा का अर्थ है – धरती का पिता।वे क्षेत्र में भगवान की तरह पूजे जाने लगे। मुंडा आदिवासी उन्हें ‘ भगवान ‘ कहकर संबोधित करते थे।अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष के लिए बिरसा ने ” उल्गुलान “का संदेश दिया था। उल्गुलान से तात्पर्य है – महान हलचल। वास्तव में भगवान बिरसा मुंडा ने छोटा नागपुर के पठार में हलचल पैदा कर अंग्रेजी सत्ता की नींव हिला दी थी। उल्गुलान के सुधारवादी और क्रांतिकारी विचारों ने मुंडाओं को एकता के सूत्र में बांध दिया था। उनके विचारों ने मुंडा लोगों में नयी चेतना जागृत की।वे अपने भगवान के आदेश पर अमल करने लगे थे।

बिरसा के नेतृत्व में मुंडा विद्रोह ने अंग्रेजों के नाक में दम कर रखा था।1897 – 1900 के मध्य मुंडा विद्रोही और अंग्रेजों के मध्य कई छापामार युद्ध हुये।

अगस्त 1897 में सैकड़ों की संख्या में मुंडा विद्रोहियों ने खूंटी पुलिस थाने पर धावा बोल दिया।1898 में तांगा नदी के किनारे मुंडा विद्रोही और ब्रिटिश सैनिकों के बीच कई युद्ध हुये। पहले तो विद्रोही अंग्रेज सेना पर भारी पड़े लेकिन बाद में ब्रिटिश सेना की जीत हुई।तीर – कमान और पारंपरिक अस्त्र,शस्त्र आधुनिक तोप – बंदूकों के आगे निस्तेज हो गये।

डोम्बरी पहाड़ी पर जनवरी 1900 में बिरसा जनसमुदाय को संबोधित कर रहे थे।इसी दौरान सभा में उपस्थित जनसमूह और ब्रिटिश सैनिकों के बीच संघर्ष हुआ।इस संघर्ष में कई औरत और बच्चे मारे गये। बिरसा के समर्थकों को गिरफ्तार कर लिया गया।

बिरसा अंग्रेजों के आंखों की किरकिरी बन चुके थे। काफी खोजबीन के बाद अन्ततः 3 फरवरी 1900 को जमकोपाई जंगल से बिरसा को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के बाद उन्हें रॉंची जेल लाया गया। रहस्यमयी परिस्थितियों में 9 जून 1900 ई.को जैल में ही बिरसा की मृत्यु हुई। ब्रिटिश सरकार द्वारा बिरसा की मृत्यु हैजा होने से बताया गया परंतु बिरसा के अनुयायियों का दावा है कि उन्हें धीमा जहर देकर मार डाला गया।

 

उल्गुलान का संदेश आज भी प्रासंगिक है

 

आज भी बिरसा अपने विचारों के कारण आदिवासियों के मध्य भगवान का दर्जा रखते हैं।शरीर नाशवान है पर विचार अमर हैं।आज भी झारखण्ड और झारखंड से लगे सीमावर्ती राज्यों छत्तीसगढ़, बिहार, उड़ीसा, मध्यप्रदेश और प.बंगाल के आदिवासियों के मध्य बिरसा मुंडा आराध्य देव /भगवान की तरह पूजित हैं।

जिस तरह से आदिवासी क्षेत्रों में बाहरी घुसपैठ, आदिवासियों के मध्य बढ़ता धर्मान्तरण,, अनुसूचित क्षेत्रों के संवैधानिक अधिकारों में कटौती का प्रयास, जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण की कटौती एवं जल, जंगल और जमीन से जुड़े मुद्दों और समस्याओं पर सरकार की अनदेखी , लापरवाही पूर्ण रवैया वर्तमान में दृष्टिगत हो रहा है वह

निश्चित रूप से आदिवासियों को उल्गुलान के लिए प्रेरित कर रहा है और कहीं न कहीं बिरसा के विचार आदिवासियों को हक हुकूक की लड़ाई के लिये मार्गदर्शन दे रहे हैं।

 

बिरसा मुंडा की स्मृति में दिवस/नामकरण

 

झारखंड राज्य की राजधानी रॉंची मेंं बिरसा मुंडा की आदमकद प्रतिमा स्थापित है। अंतरराष्ट्रीय विमानपत्तन रॉंची का नामकरण बिरसा मुंडा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा किया गया है एवं रॉंची केन्द्रीय जेल का नामकरण भी इनके नाम पर है।

केन्द्र सरकार ने जनजातियों के योगदान को महत्व देते हुये और स्वतंत्रता संग्राम में बिरसा के महत्व को दृष्टिगत करते हुए 10 नवंबर 2021 को बिरसा मुंडा की जयंती 15 नवंबर को प्रतिवर्ष जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की है ‌।

 

धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा की जन्म – जयंती पर उन्हें शत-शत नमन।

साभार भगेश्वर पात्र

Bindesh Patra

युवा वहीं होता हैं, जिसके हाथों में शक्ति पैरों में गति, हृदय में ऊर्जा और आंखों में सपने होते हैं।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!