
अमुस तिहार से बस्तर दशहरा का शुभारंभ, पाट जात्रा विधान के साथ शुरू होगा 75 दिवसीय पर्व
हरियाली अमावस्या पर बस्तर के जनजातीय समाज में खुशहाली और प्रकृति पूजा का पर्व, टुरलु खोटला की होगी विधिवत पूजा
नारायणपुर। श्रावण अमावस्या यानी हरियाली अमावस्या बस्तर के लोक जीवन में विशेष महत्व रखती है। इस दिन जनजातीय समाज अमुस तिहार के रूप में प्रकृति, खेती, पशुधन और ग्राम देवताओं की पूजा करता है। इसी दिन बस्तर का प्रसिद्ध 75 दिवसीय दशहरा पर्व भी पाट जात्रा विधान के साथ शुरू होता है। इस वर्ष अमुस तिहार के अवसर पर बस्तर दशहरा के प्रारंभिक विधान टुरलु खोटला पूजा के साथ दशहरा पर्व की औपचारिक शुरुआत होगी।
बस्तर में अमुस तिहार को खुशहाली और हरियाली के आगमन से जोड़कर देखा जाता है। सावन में बारिश के बाद खेतों में फसलें लहलहाने लगती हैं और जंगलों में वनस्पतियां हरियाली से भर जाती हैं। ऐसे समय में किसान प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करते हुए अपने कृषि उपकरणों, पशुधन और खेतों की पूजा करते हैं।
अमुस तिहार में निभाई जाती हैं कई पारंपरिक रस्में
बस्तर के माड़िया, मुरिया, भतरा, हल्बा, परजा, धुरवा और गोंड सहित विभिन्न जनजातीय समाजों के साथ कई पारंपरिक समुदाय सदियों से इस क्षेत्र में निवास करते आए हैं। इनके सामाजिक संपर्क और परंपराओं ने बस्तर की लोक संस्कृति को विशिष्ट पहचान दी है।
अमुस तिहार पर गांवों में पशुधन की देखभाल से जुड़े लोगों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। परंपरा के अनुसार धोरई जंगल से सतावरी, रसना जड़ी और भेलवां जैसी वनस्पतियां लाकर उनकी पूजा करते हैं। इसके बाद इन्हें घरों के मुख्य द्वार पर बांधने की परंपरा है।
इसी तरह लोहार द्वारा घरों की चौखट और कृषि से जुड़े सामानों पर दुर्गागोटी ठोंकने की रस्म निभाई जाती है। इसे हल्बी में खुंटी ठेचतो कहा जाता है। सेवा के बदले लोहार और धोरई को अनाज अथवा अन्य पारंपरिक सामग्री देने की भी परंपरा रही है।
खेती और कृषि उपकरणों की पूजा
अमुस तिहार के दिन किसान अपने खेतों की पूजा करते हैं। हल, जुआड़ी, फावड़ा, कुदाली, गैती, सब्बल और हंसिया सहित कृषि उपकरणों को साफ कर उनकी पूजा की जाती है।
कई क्षेत्रों में किसान खेतों में तेन्दूडारा गाड़कर उसके साथ भेलवां पान, सतावरी और रसना जड़ी बांधते हैं। इसे फसल की सुरक्षा से जुड़ी पारंपरिक विधि माना जाता है।
जनजातीय समाज में इन वनस्पतियों और जड़ी-बूटियों के औषधीय उपयोग का पारंपरिक ज्ञान पीढ़ियों से चला आ रहा है। इनके कई उपयोग स्थानीय लोक चिकित्सा और पशुधन उपचार की परंपराओं से जुड़े हुए हैं। हालांकि इन पारंपरिक उपचारों को आधुनिक चिकित्सा का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।
जोगाने की परंपरा का विशेष महत्व
बस्तर के ग्रामीण और जनजातीय समाज में बरसात के मौसम में मिलने वाली कई वनस्पतियों और साग-सब्जियों को उपयोग में लेने से पहले ग्राम देवी या इष्टदेव को अर्पित करने की परंपरा है। इसे जोगाना कहा जाता है।
अमुस तिहार के दिन जीर्रा भाजी, चेंच भाजी और धोबा भाजी सहित कई वनस्पतियों को देवस्थल में अर्पित किया जाता है। तेन्दू, सतावरी, रसना जड़ी, भेलवां और कुमी बेल को भी इस परंपरा से जोड़ा जाता है।
अबूझमाड़ और वनांचल के कई गांवों में माटी गायंता द्वारा ग्रामदेवी की पूजा कर धान, मक्का और कोसरा सहित विभिन्न फसलों के फूल अर्पित किए जाते हैं। गोंडी और माड़िया बोली में इस रस्म को पुंगार वेड़ना या पुल वेड़ताना कहा जाता है, जिसका अर्थ फूल बांधना माना जाता है।
अमुस तिहार में गेड़ी खेल की परंपरा
अमुस तिहार का एक आकर्षक हिस्सा गेड़ी खेल भी है। बच्चे और युवा गेड़ी पर चढ़कर खेलते और मनोरंजन करते हैं। गोंडी में इसे डिटोंग कहा जाता है।
पुराने समय में बरसात के दौरान कीचड़ और दलदल से गुजरने के लिए गेड़ी का उपयोग किया जाता था। समय के साथ यह उपयोग मनोरंजक खेल और परंपरा में बदल गया।
पाट जात्रा से शुरू होता है बस्तर दशहरा
बस्तर दशहरा देश के सबसे लंबे लोक पर्वों में से एक है। इसकी शुरुआत हरियाली अमावस्या के दिन होने वाले पाट जात्रा विधान से होती है।
दशहरा के रथ निर्माण के लिए अमावस्या के दिन एक विशेष लकड़ी का ठोस तना लाया जाता है, जिसे टुरलु खोटला कहा जाता है। इस तने की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। दंतेश्वरी माई सहित क्षेत्र के देवी-देवताओं का स्मरण कर निर्विघ्न रथ निर्माण और दशहरा पर्व के सफल आयोजन की कामना की जाती है।
पाट जात्रा की यह परंपरा बस्तर दशहरा की शुरुआत का महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक विधान मानी जाती है। इसके बाद आने वाले दिनों में रथ निर्माण सहित दशहरा पर्व से जुड़े विभिन्न पारंपरिक विधान आगे बढ़ते हैं।
लोक संस्कृति और परंपराओं का जीवंत दस्तावेज
लोक साहित्यकार एवं जनजातीय शोधकर्ता डॉ. भागेश्वर पात्र के अनुसार अमुस तिहार बस्तर के जनजातीय और पारंपरिक समाज के जीवन में खुशहाली, प्रकृति और कृषि से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व है। अलग-अलग क्षेत्रों में इसे मनाने की विधि में कुछ अंतर जरूर दिखाई देता है, लेकिन इसकी मूल परंपराओं में काफी समानता देखने को मिलती है।
अमुस तिहार केवल एक त्यौहार नहीं बल्कि बस्तर के लोक जीवन में प्रकृति, कृषि, पशुधन, ग्राम देवता और सामाजिक परंपराओं के बीच गहरे संबंध को दर्शाने वाला पर्व है। इसी हरियाली अमावस्या पर पाट जात्रा के साथ बस्तर दशहरा की शुरुआत इस पूरे पर्व को और विशेष बना देती है।
स्रोत: डॉ. भागेश्वर पात्र की पुस्तक ‘हल्बा जनजाति: संस्कृति एवं परंपराएं’ से उद्धृत।




