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International: हिमालयी संकट का महा-विस्तार: भीषण तबाही के बाद नेपाल ने मांगी 5 अरब डॉलर की क्षतिपूर्ति, खदानों के लिए कटते जंगलों के बीच भारत के सामने भी खड़ी हुई बड़ी चुनौती

जंगलों की कटाई से बिगड़ रहा जल चक्र और पर्यावरण संतुलन

 

 

काठमांडू / रायपुर / दंडकारण्य दर्पण। नेपाल में हाल ही में आई भीषण प्राकृतिक विभीषिका और भारत में लगातार हो रही जंगलों की कटाई ने पूरे दक्षिण एशिया में पर्यावरण और जलवायु संकट को एक बेहद संवेदनशील मोड़ पर ला खड़ा किया है। लगातार बाढ़, ग्लेशियर ढहने और बिगड़ते मौसम से जूझ रहा नेपाल अब राहत सहायता की जगह शीर्ष उत्सर्जक देशों से ‘जलवायु मुआवजा’ (Climate Compensation) मांग रहा है, वहीं भारत के भीतर प्राचीन जंगलों का तेजी से होता विनाश इस संकट की आग में घी डालने का काम कर रहा है।

आपदा का खौफनाक मंजर: 1000 से अधिक मौतें, हजारों लापता नेपाल की भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों में 20 से 30 मीटर ऊंची उठीं लहरों और 180 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से बहते पानी ने भारी तबाही मचाई है।

  • हताहत व नुकसान: इस आपदा में अब तक 1,003 लोगों की जान जा चुकी है, जबकि नेपाल और तिब्बत को मिलाकर करीब 4,000 लोग लापता हैं।
  • रेस्क्यू अभियान: 10,000 से अधिक लोगों को एयरलिफ्ट और रेस्क्यू के माध्यम से सुरक्षित निकाला गया है।
  • भारतीयों की स्थिति: भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार 158 भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकाला जा चुका है, जबकि 275 से अधिक भारतीय अभी भी संपर्क से बाहर हैं।

UN से 5 अरब डॉलर की मांग और वैश्विक चेतावनी नेपाल ने इस त्रासदी से उबरने के लिए 5 अरब डॉलर (लगभग 41,500 करोड़ रुपये) के नुकसान का आकलन किया है और संयुक्त राष्ट्र के ‘क्लाइमेट-डिजास्टर रिकवरी फंड’ से तुरंत सहायता मांगी है। नेपाल के पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार मानव जनित जलवायु परिवर्तन ने इस स्थिति को और गंभीर बनाया है। नेपाल ने यह गंभीर चेतावनी भी दी है कि यदि हिमालयी ग्लेशियर इसी रफ्तार से पिघलते रहे, तो गंगा और त्रिशूली जैसी नदियों पर निर्भर दक्षिण एशिया के 2 अरब से अधिक लोगों का जल सुरक्षा तंत्र हमेशा के लिए नष्ट हो जाएगा।

भारत का आंतरिक संकट: खदानों के लिए करोड़ों प्राचीन जंगलों की बलि एक तरफ जहां नेपाल वैश्विक मंच पर जलवायु परिवर्तन की दुहाई दे रहा है, वहीं दूसरी ओर भारत के भीतर कोयला और लोहा निकालने के लिए करोड़ों की संख्या में प्राचीन जंगलों को बेधड़क काटा जा रहा है। घने और पुराने जंगल धरती के प्राकृतिक ढाल की तरह काम करते हैं। जब इन वृक्षों को हटाया जाता है, तो जमीन की नमी समाप्त होती है, वायुमंडल का तापमान बढ़ता है और असमय सूखा या भीषण बाढ़ जैसी स्थितियां पैदा होती हैं। जंगलों के इस विनाश से न केवल तापमान में रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की जा रही है, बल्कि नदियां और भूमिगत जल स्रोत भी सूख रहे हैं।

मदद नहीं हर्जाना: कूटनीति में नेपाल का बड़ा बदलाव नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल के अनुसार नेपाल अब मानवीय मदद के बजाय क्षति और नुकसान की भरपाई (Loss and Damage) की सीधी जवाबदेही तय कराएगा। नेपाल ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर चीन, अमेरिका और भारत को बड़े उत्सर्जक देशों में शामिल करते हुए तर्क दिया है कि इन देशों के औद्योगिक उत्सर्जन का खामियाजा नेपाल जैसे कम उत्सर्जन वाले देशों को भुगतना पड़ रहा है।

भारत के लिए दोहरी चुनौती यह संपूर्ण घटनाक्रम भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। एक तरफ भारत और नेपाल दोनों साझा हिमालयी पारिस्थितिकी से जुड़े हैं, जहां नदियों का जलस्तर और पर्यावरण का बिगड़ना दोनों देशों की सीमावर्ती आबादी को प्रभावित करता है। वहीं दूसरी तरफ, देश के भीतर खदानों के नाम पर हो रही जंगलों की अंधाधुंध कटाई भारत के खुद के तापमान और जल चक्र को बिगाड़ रही है। यदि समय रहते खनन नीतियों के साथ-साथ पर्यावरणीय संतुलन पर कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जलवायु संकट का यह दबाव आने वाले दिनों में और अधिक विकराल रूप ले सकता है।

Bindesh Patra

युवा वहीं होता हैं, जिसके हाथों में शक्ति पैरों में गति, हृदय में ऊर्जा और आंखों में सपने होते हैं।

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