
दंडकारण्य दर्पण
छत्तीसगढ़ में 7 संगठनों पर प्रतिबंध बढ़ा, नक्सलवाद पर सियासत तेज
रायपुर/बस्तर
छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद को लेकर एक बार फिर सियासत गरमा गई है। राज्य सरकार ने 7 संगठनों पर एक साल के लिए प्रतिबंध बढ़ा दिया है। सरकार का कहना है कि ये संगठन नक्सली नेटवर्क से जुड़े हुए हैं और उनकी गतिविधियां आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बन रही थीं। हालांकि बिना विस्तृत कारण सार्वजनिक किए गए इस फैसले ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है।
बस्तर क्षेत्र में एक ओर नक्सल मुक्त होने के दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इन संगठनों पर बैन ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम 2005 के तहत जिन संगठनों पर प्रतिबंध बढ़ाया गया है, उनमें कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया माओवादी, दंडकारण्य आदिवासी किसान मजदूर संघ, क्रांतिकारी आदिवासी महिला संघ, क्रांतिकारी आदिवासी बालक संघ, क्रांतिकारी किसान कमेटी, महिला मुक्ति मंच और जनताना सरकार शामिल हैं।
प्रतिबंध के बाद राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि नक्सली संगठनों की जड़ें कांग्रेस शासनकाल में पनपीं, जबकि कांग्रेस ने पलटवार करते हुए आरोप लगाया कि 15 साल के भाजपा शासन में नक्सलवाद और ज्यादा फैला। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि बिना स्पष्ट कारण बताए किसी संगठन पर प्रतिबंध लगाना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है और यदि खतरा है तो जनता को इसकी जानकारी दी जानी चाहिए।
वहीं सरकार की ओर से सफाई देते हुए भाजपा नेताओं ने कहा कि यह फैसला सुरक्षा एजेंसियों के इनपुट के आधार पर लिया गया है। उनका कहना है कि सभी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती क्योंकि बस्तर की सुरक्षा सर्वोपरि है। सरकार का दावा है कि केंद्र और राज्य मिलकर नक्सलवाद को जड़ से खत्म करने की दिशा में लगातार काम कर रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच बस्तर में स्थिति को लेकर असमंजस की स्थिति भी बनी हुई है। एक तरफ विकास और शांति की बात की जा रही है, वहीं ऐसे फैसले संकेत देते हैं कि खतरा अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। अब सवाल यही है कि यह प्रतिबंध केवल एहतियाती कदम है या फिर क्षेत्र में नक्सली प्रभाव के बने रहने का संकेत, इसका जवाब आने वाला समय ही देगा।




