CG News: “अक्ति तिहार: बस्तर का कृषि नववर्ष, आस्था और प्रकृति का अद्भुत संगम”

दंडकारण्य दर्पण
“अक्ति तिहार: बस्तर का कृषि नववर्ष, आस्था और प्रकृति का अद्भुत संगम”
नारायणपुर/बस्तर।
“तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे है मेरा” की भावना के साथ बस्तर अंचल में मनाया जाने वाला अक्ति तिहार लोक आस्था, प्रकृति पूजा और कृषि परंपरा का अनूठा पर्व है। यह त्यौहार न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि बस्तर की सांस्कृतिक पहचान को भी विश्व पटल पर स्थापित करता है।
अक्ति तिहार, जिसे अक्षय तृतीया के नाम से भी जाना जाता है, वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। ‘अक्षय’ का अर्थ होता है—जो कभी समाप्त न हो, अर्थात् अजर-अमर और अनंत। मान्यता है कि इस पावन दिन किए गए सभी कार्य शुभ और सफल होते हैं।
इस पर्व में बस्तर के लोग प्रकृति के प्रति अपनी आस्था प्रकट करते हुए विभिन्न वृक्षों और फलों की पूजा करते हैं। इनमें आम, चिरौंजी, महुआ, सेहरा, बेहड़ा, पीपल, बरगद, कुडई और सरई जैसे महत्वपूर्ण वृक्ष शामिल हैं, जो बस्तर की जैव विविधता और जीवन शैली का अभिन्न हिस्सा हैं।
बस्तर अंचल में अक्ति तिहार को कृषि नववर्ष के रूप में भी विशेष महत्व प्राप्त है। इस दिन से किसान नए कृषि कार्यों की शुरुआत करते हैं। चूंकि भारत एक कृषि प्रधान देश है और यहां का जनजीवन कृषि पर आधारित है, इसलिए यह पर्व किसानों के लिए नई उम्मीद, ऊर्जा और समृद्धि का प्रतीक बनकर आता है।
बस्तर के पारंपरिक त्यौहार—चाहे वह तीजा-पोरा हो या हरेली—सभी में कृषि और प्रकृति का गहरा संबंध देखने को मिलता है। अक्ति तिहार इसी श्रृंखला का प्रमुख पर्व है, जो न केवल खेती की शुरुआत का संकेत देता है बल्कि इसे बस्तर का नववर्ष भी माना जाता है।
इस प्रकार अक्ति तिहार केवल एक पर्व नहीं, बल्कि बस्तर की संस्कृति, आस्था और प्रकृति के साथ उसके गहरे रिश्ते का जीवंत उदाहरण है।





