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CG News: डेडलाइन के आखिरी दिन ‘नक्सल मुक्त’ दावे के बीच एक और सरेंडर, क्या बदल रहा है अबूझमाड़?

नारायणपुर से ग्राउंड रिपोर्ट: डेडलाइन के आखिरी दिन ‘नक्सल मुक्त’ दावे के बीच एक और सरेंडर, क्या बदल रहा है अबूझमाड़?

छत्तीसगढ़ को नक्सल मुक्त बनाने के सरकारी दावे की तय समय-सीमा आज समाप्त हो गई। इसी बीच नारायणपुर से एक अहम खबर सामने आई है—पुलिस ने एक नक्सली के आत्मसमर्पण और हथियार बरामद होने की जानकारी दी है। सवाल यह है कि क्या ये घटनाएं बड़े बदलाव का संकेत हैं? और क्या अबूझमाड़ जैसे दुर्गम इलाकों में वाकई हालात बदल रहे हैं?

नारायणपुर, बस्तर संभाग का वह इलाका, जहां का अबूझमाड़ क्षेत्र लंबे समय तक नक्सल गतिविधियों का मजबूत गढ़ माना जाता रहा। घने जंगल, कठिन भौगोलिक परिस्थितियां और सीमित पहुंच—इन सबने इसे सुरक्षा बलों के लिए बड़ी चुनौती बना रखा था।

 

लेकिन अब तस्वीर बदलती दिख रही है। डेडलाइन के आखिरी दिन नारायणपुर पुलिस ने एक नक्सली के आत्मसमर्पण की पुष्टि की है। पुलिस के अनुसार, नक्सली के पास से हथियार भी बरामद किया गया है, जिसे करीब डेढ़ महीने पहले की गतिविधियों से जुड़ा माना जा रहा है।

 

पुलिस अधीक्षक रॉबिंसन गुरीया ने एशियन न्यूज़ से बातचीत में कहा कि यह केवल एक घटना नहीं, बल्कि लगातार चल रहे अभियानों और रणनीतिक बदलाव का परिणाम है। उनके मुताबिक, अबूझमाड़ जैसे बीहड़ और लंबे समय तक ‘अभेद्य’ माने जाने वाले इलाके में भी सुरक्षा बलों ने अपनी पकड़ मजबूत की है।

 

उन्होंने बताया कि पिछले कुछ समय में नक्सलियों के आत्मसमर्पण की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है, और यह इस बात का संकेत है कि संगठन के भीतर दबाव बढ़ रहा है। साथ ही, स्थानीय स्तर पर लोगों का सहयोग भी पहले की तुलना में अधिक मिल रहा है।

 

अबूझमाड़: बदलती तस्वीर

अबूझमाड़ का नाम कभी उस क्षेत्र के रूप में लिया जाता था, जहां प्रशासन की पहुंच बेहद सीमित थी। लेकिन अब सड़क निर्माण, सुरक्षा कैंपों की स्थापना और विकास योजनाओं के विस्तार के कारण स्थिति धीरे-धीरे बदल रही है।

 

ग्राउंड पर मौजूद लोगों का कहना है कि अब पहले जैसा भय का माहौल नहीं है। हालांकि पूरी तरह सामान्य स्थिति अभी भी एक लक्ष्य है, लेकिन बदलाव की दिशा साफ नजर आती है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि नक्सलवाद से लड़ाई केवल सैन्य या पुलिस कार्रवाई से नहीं जीती जा सकती। इसके लिए विकास, विश्वास और संवाद की समानांतर प्रक्रिया जरूरी होती है।

 

नारायणपुर और अबूझमाड़ में जो बदलाव दिख रहा है, वह इन तीनों कारकों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम माना जा रहा है—

 

लगातार सुरक्षा अभियान

 

आत्मसमर्पण की बढ़ती घटनाएं

 

आधारभूत सुविधाओं का विस्तार

 

स्थानीय समुदाय का बढ़ता भरोसा

नक्सल मुक्त छत्तीसगढ़ की डेडलाइन भले ही आज समाप्त हो गई हो, लेकिन नारायणपुर से जो तस्वीर उभर रही है, वह एक संक्रमण काल की ओर इशारा करती है—जहां संघर्ष से स्थिरता की ओर बढ़ने की प्रक्रिया जारी है।

 

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या यह बदलाव स्थायी रूप ले पाएगा? और क्या अबूझमाड़ जैसे इलाके पूरी तरह मुख्यधारा से जुड़ पाएंगे?

 

 

Bindesh Patra

युवा वहीं होता हैं, जिसके हाथों में शक्ति पैरों में गति, हृदय में ऊर्जा और आंखों में सपने होते हैं।

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