
22 साल बाद घर लौटा जगतार, सात पूर्व माओवादियों ने चुना शांति का रास्ता
मुल्ला पुनर्वास केंद्र में प्रशिक्षण लेकर लौटे अपने गांव, परिवारों में छाई खुशी
दंडकारण्य दर्पण | कांकेर
संवाददाता – अंकुर तिवारी
बस्तर के जंगलों में कभी माओवादी संगठन का हिस्सा रहे सात लोगों ने अब हिंसा का रास्ता छोड़कर समाज की मुख्यधारा में नई जिंदगी शुरू की है। भानुप्रतापपुर के मुल्ला स्थित पुनर्वास केंद्र में प्रशिक्षण और पुनर्वास की प्रक्रिया पूरी करने के बाद सभी अपने परिवारों के बीच लौट गए हैं। वर्षों बाद अपनों को वापस पाकर परिवारों में खुशी का माहौल है।
मुख्यधारा में लौटे ये सात पूर्व माओवादी बस्तर, गरियाबंद और राजनांदगांव के दुर्गम क्षेत्रों में सक्रिय रहे हैं। राज्य और केंद्र सरकार की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति तथा विकास योजनाओं से प्रभावित होकर उन्होंने संगठन छोड़कर सामान्य जीवन जीने का फैसला किया।
इनमें सुगरो टेकाम और मानबती वर्ष 2006 से गरियाबंद क्षेत्र में सक्रिय थे। दोनों ने 7 नवंबर 2025 को सुरक्षा बलों के समक्ष आत्मसमर्पण किया था।
हथियार छोड़े, हाथों में आया हुनर
पुनर्वास केंद्र में पूर्व माओवादियों को केवल सुरक्षित वातावरण ही नहीं दिया गया, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए रोजगारपरक प्रशिक्षण भी दिया गया।
कौशल विकास योजना के तहत काष्ठशिल्प, ड्राइविंग, राजमिस्त्री और सिलाई जैसे विभिन्न ट्रेड में प्रशिक्षण दिया गया। मुख्यधारा की जिंदगी में जरूरी दस्तावेज उपलब्ध कराने के लिए आधार और पैन कार्ड बनवाए गए। बैंक खाते खोलकर सरकारी योजनाओं से जुड़ने की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई।
प्रशिक्षण का उद्देश्य स्पष्ट था कि आत्मसमर्पण के बाद लौटने वाले लोग अपने पैरों पर खड़े हो सकें और सम्मान के साथ नया जीवन शुरू कर सकें।
22 साल बाद परिवार के बीच पहुंचा जगतार
कोड़ेकुर्से क्षेत्र निवासी जगतार सिंह उर्फ सुनील वर्ष 2004 में माओवादी संगठन में शामिल हुआ था। वह उदंती एरिया कमेटी के कमांडर के रूप में सक्रिय रहा। उस पर आठ लाख रुपये का इनाम घोषित था।
करीब 22 साल बाद जब वह अपने परिवार के बीच पहुंचा तो भावुक हो गया। लंबे अंतराल के बाद सुरक्षित घर लौटने की खुशी उसकी आंखों में साफ दिखाई दी।
जगतार ने कहा कि इतने वर्षों बाद परिवार के बीच लौटने की खुशी को शब्दों में बताना मुश्किल है। पुनर्वास केंद्र में बिताया समय उसके जीवन में बदलाव का महत्वपूर्ण दौर रहा।
कमला, नरसिंग, जुगन और सामको ने भी चुनी नई राह
मेंडा क्षेत्र निवासी कमला, नरसिंग, जुगन और सामको ने भी पुनर्वास की प्रक्रिया पूरी कर ली है। अब ये सभी हिंसा और जंगल के जीवन से दूर शांतिपूर्ण तरीके से अपना भविष्य बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
इनकी वापसी केवल परिवारों के लिए खुशी का अवसर नहीं है, बल्कि उन लोगों के लिए भी एक उदाहरण है जो अभी भी हिंसा के रास्ते पर हैं कि हथियार छोड़कर सामान्य जीवन में लौटने का रास्ता खुला है।
पुनर्वास से लौट रही जिंदगी की रोशनी
बस्तर में माओवादी हिंसा के खिलाफ सुरक्षा अभियानों के साथ आत्मसमर्पण और पुनर्वास की प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। सरकार का जोर आत्मसमर्पण करने वालों को सुरक्षा देने के साथ उन्हें रोजगार, कौशल और सम्मानजनक जीवन के अवसर उपलब्ध कराने पर है।
केंद्र सरकार ने 31 मार्च तक बस्तर संभाग को नक्सलवाद से मुक्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया था। ऐसे में माओवादी संगठन छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौट रहे लोगों का पुनर्वास इस अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
सात पूर्व माओवादियों की घर वापसी की कहानी इस बदलाव का मानवीय चेहरा सामने लाती है। कभी जिन हाथों में हथियार थे, उन्हीं हाथों में अब हुनर है और सामने परिवार के साथ शांतिपूर्ण जीवन की नई शुरुआत।




