CG: कभी हाथों में हथियार, आज जवानों की कलाई पर रक्षा सूत्र
नारायणपुर में रक्षाबंधन की अनोखी तस्वीर, आत्मसमर्पित नक्सली दीदियों ने बांधी बस्तर फाइटर्स और DRG जवानों को राखी

कभी हाथों में हथियार, आज जवानों की कलाई पर रक्षा सूत्र
नारायणपुर में रक्षाबंधन की अनोखी तस्वीर, आत्मसमर्पित नक्सली दीदियों ने बांधी बस्तर फाइटर्स और DRG जवानों को राखी
नारायणपुर। कभी अबूझमाड़ के जंगलों में नक्सली संगठन के साथ रहकर पुलिस और सुरक्षा बलों को निशाना बनाने वाली महिलाएं आज बदलाव की नई कहानी लिख रही हैं। रक्षाबंधन के पावन अवसर पर आत्मसमर्पित नक्सली महिलाओं ने बस्तर फाइटर्स और DRG (डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड) के जवानों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर भाई-बहन के रिश्ते को मजबूत किया।
यह दृश्य सिर्फ रक्षाबंधन का उत्सव नहीं, बल्कि हिंसा से विकास, अविश्वास से विश्वास और अंधेरे से नए सवेरे की ओर बढ़ते अबूझमाड़ की तस्वीर बन गया।
आत्मसमर्पित नक्सली दीदियों ने जवानों की कलाई पर राखी बांधते हुए यह संदेश दिया कि अब वे समाज की मुख्यधारा से जुड़कर देश, समाज और क्षेत्र के विकास में अपना योगदान देना चाहती हैं। जिन हाथों में कभी नक्सल संगठन का प्रभाव था, उन्हीं हाथों से आज जवानों की कलाई पर भरोसे और सुरक्षा का रक्षा सूत्र बंधा।
जिनसे कभी थी मुठभेड़, आज उन्हीं की कलाई पर राखी
बस्तर फाइटर्स और DRG के जवानों ने नक्सल विरोधी अभियानों में लंबे समय तक कठिन परिस्थितियों में मोर्चा संभाला है। इन अभियानों में कई जवानों ने सर्वोच्च बलिदान दिया, वहीं बड़ी संख्या में नक्सली मारे गए और कई ने हिंसा का रास्ता छोड़कर आत्मसमर्पण किया।
आज उसी संघर्ष के बीच एक नई तस्वीर सामने आई है। बंदूक और बारूद की जगह राखी और भाईचारे ने ले ली है।
अबूझमाड़ और नारायणपुर में नक्सल प्रभाव कम होने के साथ विकास की नई संभावनाएं आकार ले रही हैं। कभी जहां गोलियों की आवाज गूंजती थी, वहां अब शिक्षा, सड़क, स्वास्थ्य, रोजगार और विकास की उम्मीद दिखाई दे रही है।
रक्षाबंधन की यह तस्वीर सिर्फ एक त्योहार की तस्वीर नहीं, बल्कि बदलते बस्तर की कहानी है—एक नया विश्वास, एक नई उम्मीद और एक नए सवेरे की शुरुआत।





