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Chhattisgarh: बस्तर के अंतिम राजा ‘ राजा प्रवीणचंद्र भंजदेव’ के हत्या की अनसुनी कहानी आदिवासियों के देवतुल्य राजा से आखिर कांग्रेस को क्यों थी परेशानी ?…..

संवाददाता – सीमा कोमरे

बस्तर के अंतिम राजा ‘ राजा प्रवीणचंद्र भंजदेव’ के हत्या की अनसुनी कहानी आदिवासियों के देवतुल्य राजा से आखिर कांग्रेस को क्यों थी परेशानी ?…..

 

 

25 मार्च 1966 बस्तर के राजमहल को अचानक पुलिस ने चारों ओर से घेर लिया महल के अंदर राजा प्रवीण चंद्रभंज देव और उनके सुरक्षा में तनाव कुछ आदिवासी समुदाय के लोग मौजूद थे और महल के बाहर भी आदिवासी समुदाय के लोग बड़ी संख्या में शिकार में जाने के लिए राजा से आज्ञा लेने आए थे तभी अचानक तत्कालीन सरकार की भेजे गए पुलिस ने महल के बाहर आदिवासियों पर बिना चेतावनी दिए गोलियां चला दी जिसमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे कई बच्चे, बूढी तथा महिलाएं गोलियों का शिकार हो गए और कुछ ही देर में राजा का शरीर भी गोलियों से छल्ली कर दिया गया।

 

बस्तर के राजमहल में हर तरफ बस खून ही खून बह रही थी राजा प्रवीण चंद्र भंजदेव को उनके ही राजमहल में गोलियों से भून दिया गया।

 

आज भी लोग राजा की मौत का सत्य जानना चाहते हैं जिसके दो अलग-अलग मत सामने आती है।

 

आखिर राजा को क्यों मारा गया था? राजा प्रवीण चंद्रा ने क्या अपराध किया था ?

 

बस्तर का यहां क्षेत्र आजादी के बाद मध्य प्रदेश के हिस्से में आया जो कि बाद मे छत्तीसगढ़ में शामिल हो गया ।

 

आजादी के पूर्व बस्तर में अंग्रेज बहुत ही तेजी से खनन का काम कर रहे थे प्राकृतिक संपदा का दोहन कर रहे थे खदानों में बस्तर के स्थानीय आदिवासियों से अंधाधुंध मजदूरी करवाया करवाई जा रही थी ।

जिसके चलते आदिवासियों के मुखया गुंडाधर और बस्तर के राजा ने अंग्रेजों का जमकर विरोध भी किया था ,तीर धनुष और भाले से जनजाति लोगों ने अंग्रेजी सेना को मौत के घाट उतार दिया था। बदले में अंग्रेजों ने पूरी निर्माता के साथ आदिवासियों के विरोध का दमन किया सैकड़ो लोगों को अंग्रेजी हुकूमत ने मार दिया। इस वक्त राजा रुद्र प्रताप देव बस्तर के राजा थे उनकी मौत के बाद उनकी बेटी प्रफुल्ल कुमारी देवी को अंग्रेजों ने राजगद्दी में बैठा दिया।

 

 

जिनकी शादी पड़ोस के मयूरभंज स्टेट के राजकुमार प्रफुल्ल देव के साथ हुआ जिनकी 4 संताने थी उन्हीं के दूसरे बेटे थे प्रवीण चंद्रभंज देव जिनका जन्म 25 जून 1929 को हुआ था ।

अंग्रेज राजकुमारी प्रफुल्ल देवी को अपने इशारे पर चलना चाहते थे पर वह सफल नहीं हो पाए तब अंग्रेजों ने रानी प्रफुल्ल देवी को अपने रास्ते से हटाने के लिए उनके इलाज का बहाना बनाकर उन्हें लंदन भिजवा दिया जहां उनकी मृत्यु हो गई ।लेकिन यह कहा जाता है कि लंदन में अंग्रेजों ने रानी की हत्या करवा दी।

 

26 फरवरी 1936 को अंग्रेजों ने मात्र 6 साल के अबोध बालक प्रवीण चंद्र भंजदेव को यह सोचकर राजगद्दी पर बैठाया ताकि वह उन्हें अपने हाथों की कठपुतली बना सके और इसीलिए अंग्रेजों ने प्रवीण चंद्र भंजदेव को पढ़ाई के लिए लंदन भेज दिया ।18 वर्ष के होने के बाद राजा प्रवीण चंद्र भंजदेव बस्तर लौटे लेकिन राजा प्रवीण चंद्र भंजदेव यह समझ चुके थे कि अंग्रेजों का मंसूबा क्या है वह उनकी प्रजा के साथ कैसा बर्ताव करते हैं ।

 

साल 1947 जब भारत आजाद हुआ इस समय राजा प्रवीण चंद्र भंजदेव भारत लौटे राजा प्रवीण चंद्रभंज देव लंदन में पढ़ने के बावजूद बस्तर की दंतेश्वरी माता के परम भक्त थे। यह कहा जाता है राजा प्रवीण चंद् को बचपन में ही माता दंतेश्वरी के साक्षात दर्शन होते थे ।

 

 

बस्तर के राजा में बस्तर की जनजातीय लोग राम को देखते थे उन्हें ईश्वर तुल्य मानते थे क्योंकि राजा प्रवीण चंद्रभंज देव अजानुबाहु थे वैसे ही जैसे भगवान राम की हथेलियां घुटनों तक छूती थी भगवान राम भी अजानुबाहु थे ।

 

राजा प्रवीण चंद्र ने बिना किसी मूल भाव के अपने राज्य का विलय भारत में किया था हालांकि हैदराबाद के निजाम यह बिल्कुल नहीं चाहते थे कि वो या बस्तर के राजा भी भारत में विलय की संधि पर हस्ताक्षर करें लेकिन राजा प्रवीण चंद्र पहले ही विलय की पेपर पर हस्ताक्षर कर चुके थे ।अंग्रेजो के जाने के बाद राजा को उम्मीद थी कि अब बस्तर के आदिवासियों का शोषण नहीं होगा यहां की खनिज संपदा का दोहन नहीं होगा लेकिन राजा की यह सोच गलत साबित हो गई ।

 

 

 

 

आजादी के बाद राजा प्रवीण चंद्र ने कांग्रेस पार्टी ज्वाइन कर ली 1952 में मध्यप्रदेश के चुनाव में राजा प्रवीण चंद्र भंजदेव जगदलपुर की सीट से कांग्रेस की साइड से चुनाव लड़े तथा विधायक बने विधायक बनने के बाद उन्होंने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तथा तत्कालीन राष्ट्रपति को कई पत्र लिखें जिसमें बस्तर में होने वाले खनन को रोकने की बात की गई थी लेकिन उनको किसी का भी सकारात्मक जवाब नहीं मिला ।

 

इसके कुछ साल तक वो राजनीति में जुड़े रहे फिर बाद में उन्होंने विधायक के पद से इस्तीफा दे दिया इसके बाद राजा प्रवीनचंद्र भंजदेव ने पूरे बस्तर का दौर शुरू कर दिया वह गांव-गांव जाते आदिवासियों से मिलते और कहते मैं आपकी जल जंगल और जमीन की लड़ाई लडूंगा ।

 

आज बस्तर के जंगलों में गूंजने वाला नारा ‘ जल जंगल और जमीन की लड़ाई ‘ इस नारे को 1950 के दशक में राजा प्रवीण चंद्रभान देव नहीं दिया था।

 

प्रमुख तीन कारण से भारत की तत्कालीन सरकार और राजा प्रवीण चंद्र भंजदेव आमने-सामने आ गए थे –

 

 

1 . प्रगति मैदान में होने वाला जल जंगल जमीन का आंदोलन जल जंगल और जमीन को बचाने के लिए उन्होंने दिल्ली के प्रगति मैदान में बस्तर के आदिवासियों को ट्रेन में बिठाकर उनकी आदिवासी वेशभूषा।में तीर कमान के साथ दिल्ली आंदोलन में ले गए थे ।

2. धान पर बढ़ता हुआ टैक्स के विरोध में प्रदर्शन उस समय मध्य प्रदेश की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने धान पर टैक्स बढ़ा दिया इसके खिलाफ राजा ने प्रदर्शन किया सड़कों पर लोगों के साथ जन प्रदर्शन किया ।

3. बैलाडीला आयरन माइंस बस्तर के दिन माइंस को अंग्रेजों ने खोला था उसे कांग्रेस की सरकार नेशनलाइज करना चाहती थी लेकिन राजा चाहते थे की माइंस का मालिकाना हक बाहर के लोग को नहीं बल्कि यहां के लोकल आदिवासियों को मिले ।

जिसके कारण तत्कालीन सरकार व राजा को आमने-सामने आना पड़ा और इन सब प्रदर्शनों के बाद राजा को तत्कालिक सरकार ने राज्य विद्रोही बता दिया उनकी सारी संपत्ति कोर्ट ऑफ वॉइस के तहत अटैक में ले लिया गया तथा तत्कालीन कलेक्टर को सौंप दी गई उनकी सारी संपत्ति तथा उन्हें मिलने वाली प्रिवी पर्स पर भी रोक लगा दिया गया ।

 

तत्कालीन सरकार मतलब कांग्रेस ने राजा को मिलने वाले प्रिवी पर्स पर रोक लगा दी और उनकी संपत्ति जप्त कर ली गई

यही नहीं बल्कि राजा को मानसिक रोगी बताकर उन्हें स्विट्जरलैंड भेज दिया गया जहां पर स्विट्जरलैंड के डॉक्टरों ने राजा को पूरी तरह से स्वस्थ बताया।

 

इलाज के दौरान बस्तर वापस लौट के बाद राजा ने सरकार के खिलाफ संघर्ष तेजी कर दिया 1957 में मध्य प्रदेश के चुनाव में हुए दोबारा विधानसभा चुनाव हुआ तब राजा ने खुले तौर पर कांग्रेस के खिलाफ प्रचार करना शुरू कर दिया उन्होंने अपनी नई पार्टी बनाई और बस्तर के 9 सीटों पर सभी कैंडिडेट उतार दिए और उन्हें सफलता भी मिली 9 में से 8 सीटों पर उनके विधायक जीत हासिल की उनकी जीत तय थी क्योंकि बस्तर के आदिवासी उन्हें सिर्फ राजा नहीं बल्कि देवतुल्य मानते थे वह आदिवासी के भगवान थे 1963 में बस्तर की लोहंडीगुड़ा में बड़ा कार्यक्रम होने वाला था आदिवासी जंगलों से अपनी देवता को लेकर आए थे इस आयोजन में शामिल हो सके और इस कार्यक्रम में पूर्ण राजा पूर्व राजा भोपाल गए थे और जब वहां कार्य क्रम में शामिल होने गए लौट रहे थे तभी तत्कालीन सरकार ने उनकी वापसी पर पाबंदी लगा दी और और उन्हें मध्य प्रदेश के नरसिंहगढ़ की जेल में नजर बंद कर दिया गया जिससे गुस्सा आए आदिवासी पुलिस थाना के बाहर तीर से पुलिस थाना के बाहर तीर से पुलिस वालों में वार करती है । जिसके जवाब में पुलिस फायरिंग कर देती है जिससे 12 आदिवासी मारे जाते हैं इसके बाद पार्लियामेंट का एक्शन ऑर्डिनरी सेशन बुलाया गया और एक प्रस्ताव पासकर बस्तर के राजा प्रवीण चंद्र वासुदेव को उनकी गद्दी से हटा दिया गया इतना ही नहीं बल्कि उनकी बस्तर के भूतपूर्व शासक होने की मान्यता को भी समाप्त कर दिए और उनके छोटे भाई विजय चंद्रभान देव को बस्तर की गद्दी सौंप दी गई साल 1965 में तीसरी बार मध्य प्रदेश की विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को हर का सामना करना पड़ा 30 जुलाई 1963 का प्रवीण चंद्र बलदेव की संपत्ति को कोर्ट ऑफ आर्ट से मुक्त कर दिया गया 1963 से 1966 बस्तर की जनता के लिए सरकार से राजा प्रवीण चंद्रभंज देव लगातार लड़ते रहे 25 मार्च 1966 की घटना को दुर्घटना में राजा प्रवीणचंद्र भंजदेव की हत्या कर दी गई।

 

25 मार्च 1966 की घटना –

पुलिस ने राजमहल को चारों तरफ से घेर लिया कुछ समझते उससे पहले आंसू गैस छोड़ दिया गया जिसके चलते भगदड़ मच गई और तभी बिना किसी चेतावनी के पुलिस ने आदिवासियों पर फायरिंग शुरू कर दी जिसमें कई लोगों को जान चली गई।

 

जिसके बाद राजा ने महल के अंदर बैठे कई महिलाओं और बच्चों को आत्मसमर्पण करने के लिए राजी कर लिया फिर जैसे ही महिलाएं बच्चे बाहर निकले पुलिस ने बेहिसाब फायरिंग शुरू कर दी।

राजा के दाएं हाथ को गोली छू कर निकली जिसके बाद लहू लुहान राज अपने कमरे तक पहुंचे है और अपने बिस्तर पर बेसुध हो जाते हैं तभी पुलिस उनके कमरे में घुस कर उन्हें अपनी गोलियों से छल्ली कर देती है।

 

राजा के प्रत्यक्ष और उनके समर्थकों के मुताबिक उस दिन इतनी लाशे बिछी थी कि पुलिस को लाश को ट्रक में ले जाना पड़ा लेकिन सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक इस गोली कांड में राजा समेत कुल 12 लोगों मारे गए थे ।

 

चैत्र और वैशाख के महीना में आदिवासी एक्ट के लिए मतलब शिकार के लिए वनों में जाते हैं परंपरा के अनुसार इससे पहले आदिवासी समुदाय के लोग एक साथ राजा के पास उनकी अनुमति के लिए जाते हैं तभी रास्ते में कैदी को ले जा रहे पुलिस वालों से उनकी झगड़ा हो जाता है तड़प हो जाती है और अगले ही दिन राजा को राजमहल को घेर लिया गया पुलिस ने बिना किसी चेतावनी के महल में मौजूद आदिवासी पर अंधाधुंध गोलियां डाल दी और इस फायरिंग में राजा की मृत्यु हो गई उनकी आयु मात्र 37 साल की थी उनके शरीर में कुल 11 गोलियां लगी थी कहते हैं पुलिस ने घर हर उसे व्यक्ति को मार डाला जो भविष्य में गवाह बन सकता था जिसने जिसमें कुछ लोग बज गए थे इसके बाद एक जांच आयोग बुलाया गया जिसके रिपोर्ट के मुताबिक राजा समेत 12 लोगों को गोली लगी थी जिससे उनकी मृत्यु हुई इसमें राजा की राजा भी शामिल थे इस घटना पर सवाल उठने पर तत्कालीन सरकार तथा इंदिरा गांधी की तत्कालीन इंदिरा गांधी की सरकार ने कहा कि यह गोलियां पुलिस ने आत्मरक्षा के लिए चलाई थी और इस घटना में बस्तर के आदिवासियों के मन में भारत सरकार के प्रति घृणा तथा विरोध का बीज अंकुरित हो चुका था बस्तर के लोग आज भी मानते हैं ।

 

ऐसा कहा जाता है राजा प्रवीण प्रवीण चंद्र भंजदेव की हत्या इंदिरा गांधी की इशारों पर पुलिस ने की थी राजा की मृत्यु के बाद इस घटना ने बस्तर में माइनस और संसाधनों का दोहन तेजी से होने लगे जो आज तक जारी है एक वर्ष बाद 1966 में बंगाल में नक्सलबाड़ी आंदोलन हुआ जिससे हम सब परिचित हैं यह तो सभी को पता होगा इस विद्रोह को अमेरिकी एजेंसी सीआईएसएफ ने फंड दिया था राजा की मृत्यु के बाद बस्तर में नक्सलियों ने बस्तर में आदिवासियों के वर्तमान हालात और सरकार के प्रति उनके विश्वास का भरपूर फायदा उठाया और धीरे-धीरे पूरे बस्तर को अपने चंगुल में ले लिया और इसीलिए कहा जाता है कि राजा प्रवीण चंद्रभान देव की मृत्यु के बाद ही बस्तर में नक्सलवाद ने जन्म लिया या नक्सलवाद बनवा।

 

राजा प्रवीणचंद्र भंजदेव’ की हत्या के बाद बस्तर में नक्सलवाद का उदय हुआ और तेजी से फैला जो आज तक जारी है।

Bindesh Patra

युवा वहीं होता हैं, जिसके हाथों में शक्ति पैरों में गति, हृदय में ऊर्जा और आंखों में सपने होते हैं।

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