
दण्डकारण्य दर्पण
राष्ट्रपति भवन के स्वतंत्रता दिवस निमंत्रण में चमका बस्तर का गौरव, झिटकू–मिटकी को मिली राष्ट्रीय पहचान
रायपुर, 4 अगस्त। राष्ट्रपति भवन द्वारा स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आयोजित होने वाले पारंपरिक ‘एट होम’ समारोह के आधिकारिक निमंत्रण पत्र में इस वर्ष बस्तर की ऐतिहासिक लोकगाथा झिटकू–मिटकी के प्रतीक को स्थान दिया गया है। इसे पूरे छत्तीसगढ़, विशेषकर बस्तर अंचल की सांस्कृतिक विरासत के लिए ऐतिहासिक सम्मान माना जा रहा है। राष्ट्रपति भवन जैसे देश के सर्वोच्च संवैधानिक संस्थान के निमंत्रण पत्र में बस्तर की लोककला का स्थान मिलना जनजातीय संस्कृति को राष्ट्रीय स्तर पर मिली बड़ी पहचान का प्रतीक है।
वन मंत्री केदार कश्यप ने इस उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि झिटकू–मिटकी केवल एक लोकगाथा नहीं, बल्कि बस्तर की सांस्कृतिक चेतना, लोकआस्था और सामाजिक मूल्यों का जीवंत प्रतीक है। उन्होंने कहा कि लगभग तीन सौ वर्ष पुरानी यह अमर प्रेमगाथा आज भी बस्तर के जनजीवन में उतनी ही प्रासंगिक है और नई पीढ़ी को अपनी परंपराओं से जोड़ने का कार्य कर रही है।
उन्होंने बताया कि बस्तर की विश्वप्रसिद्ध ढोकरा (बेल मेटल) कला में झिटकू–मिटकी की प्रतिमाओं का विशेष महत्व है। वर्षों से इन्हें सम्मान-चिह्न और स्मृति-चिन्ह के रूप में देश-विदेश के अतिथियों को भेंट किया जाता रहा है। हाल ही में राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में भी छत्तीसगढ़ की ओर से झिटकू–मिटकी की पारंपरिक ढोकरा कलाकृति राष्ट्रपति को भेंट की गई थी। अब उसी प्रतीक को स्वतंत्रता दिवस के आधिकारिक निमंत्रण पत्र में स्थान मिलना बस्तर की कला और संस्कृति की बढ़ती राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का प्रमाण है।
मंत्री केदार कश्यप ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश की जनजातीय संस्कृति, स्थानीय परंपराओं और लोककलाओं को नई पहचान मिल रही है। वहीं मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सरकार भी बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, लोककला और जनजातीय परंपराओं को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति भवन के निमंत्रण पत्र पर झिटकू–मिटकी का अंकन केवल एक कलात्मक आकृति का चयन नहीं है, बल्कि यह बस्तर की अस्मिता, गौरव, लोकसंस्कृति और जनजातीय विरासत को पूरे देश के सामने सम्मानपूर्वक प्रस्तुत करने का ऐतिहासिक अवसर है। यह सम्मान न केवल बस्तर, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ के लिए गर्व और आत्मसम्मान का विषय है तथा राज्य की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।




