
बड़ेडोंगर वन परिक्षेत्र में अवैध कटाई: साल समेत बहुमूल्य पेड़ों पर चला आरा, विभागीय भूमिका पर सवाल
कोण्डागांव के में बड़ेडोंगर वन परिक्षेत्र के एक हिस्से में बड़े पैमाने पर पेड़ों की अवैध कटाई का मामला सामने आया है। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि वन क्रमांक 1211 में साल समेत कई बहुमूल्य प्रजातियों के पेड़ काटे गए हैं। इस घटना ने वन विभाग की निगरानी और कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या है मामला?
ग्रामीणों के मुताबिक, बड़गई ग्राम से लगे वन क्षेत्र में बीते कुछ समय से लगातार पेड़ों की कटाई हो रही है। जिन पेड़ों को निशाना बनाया गया है, उनमें साल, करंज, जामुन और सेमल जैसी प्रजातियां शामिल हैं।
स्थानीय लोगों का दावा है कि कटे हुए पेड़ों को ट्रकों में भरकर लकड़ी उद्योगों तक पहुंचाया जा रहा है। कुछ ग्रामीणों ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहा कि प्रतिदिन कई ट्रकों के जरिए लकड़ी का परिवहन हो रहा है।
उनका आरोप है कि “बिना विभागीय जानकारी के इतनी बड़ी मात्रा में लकड़ी की निकासी संभव नहीं है।”
ग्रामीणों के आरोप क्या हैं?
ग्रामीणों का कहना है कि लकड़ी तस्कर कथित तौर पर वन विभाग के मैदानी कर्मचारियों को पैसे देकर अवैध कटाई करवा रहे हैं। उनका आरोप है कि विभागीय मिलीभगत के बिना इस पैमाने पर पेड़ों की कटाई संभव नहीं है।
हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो पाई है।
वन विभाग का क्या कहना है?
मामले में वनरक्षक रतन नेताम और डिप्टी रेंजर मोहन पुजारी ने बताया कि प्रकरण दर्ज किया जा रहा है। हालांकि, जब्त की गई लकड़ियों की मात्रा और अब तक की कार्रवाई के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई।
इस संबंध में केशकाल की वन मंडलाधिकारी दिव्या गौतम ने कहा कि मामले की जांच एसडीओ स्तर के अधिकारी से कराई जाएगी। उनके मुताबिक, “जांच में जो भी दोषी पाए जाएंगे, उनके खिलाफ नियमानुसार सख्त कार्रवाई की जाएगी।”
पहले भी उठते रहे हैं सवाल
छत्तीसगढ़ के वन क्षेत्रों में अवैध कटाई और लकड़ी तस्करी के मामले समय-समय पर सामने आते रहे हैं। राज्य में वन संरक्षण के लिए हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं।
आगे क्या?
फिलहाल मामले की जांच की बात कही गई है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि जांच कितनी निष्पक्ष और पारदर्शी होती है, और क्या दोषियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई की जाती है।
वन संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थानीय स्तर पर निगरानी मजबूत नहीं की गई, तो बहुमूल्य वन संपदा को लंबे समय तक बचा पाना चुनौतीपूर्ण होगा।




