CG News: अबूझमाड़ में बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई और आगजनी से बिगड़ रहा पर्यावरण संतुलन, वन्यजीव, जलस्रोत और मानव जीवन पर मंडरा रहा खतरा, हीट वेव से पूरा छत्तीसगढ़ बेहाल
भीषण गर्मी की मार से तप रहा बस्तर जंगलों की कटाई और आग ने बढ़ाया तापमान संकट

भीषण गर्मी की चपेट में छत्तीसगढ़
जंगलों की कटाई और आग से बढ़ रहा तापमान, अबूझमाड़–बस्तर की जैव विविधता पर गहराता संकट
रायपुर। छत्तीसगढ़ इस समय भीषण गर्मी की मार झेल रहा है। प्रदेश के अधिकांश जिलों में तापमान लगातार 40 डिग्री सेल्सियस के पार बना हुआ है। मौसम विभाग के अनुसार बीते 24 घंटों में अधिकतम तापमान में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ, लेकिन गर्म हवाओं और तेज धूप ने लोगों की परेशानी बढ़ा दी है। दुर्ग में सबसे अधिक 44.8 डिग्री तापमान दर्ज किया गया, जबकि रायपुर में पारा 44.2 डिग्री तक पहुंच गया। नारायणपुर में 41.4 डिग्री, बिलासपुर में 44 डिग्री, अंबिकापुर में 41.3 डिग्री और जगदलपुर में 42.4 डिग्री तापमान रिकॉर्ड किया गया। मौसम विभाग ने हीट वेव अलर्ट जारी करते हुए लोगों को दोपहर 12 बजे से शाम 4 बजे तक बिना जरूरी काम के धूप में नहीं निकलने की सलाह दी है।
इसी बीच बस्तर और विशेष रूप से अबूझमाड़ क्षेत्र में जंगलों की कटाई और आगजनी को लेकर गंभीर चिंताएं सामने आने लगी हैं। स्थानीय ग्रामीणों और पर्यावरण से जुड़े लोगों का कहना है कि नक्सल प्रभाव कम होने के बाद कई इलाकों में तेजी से जंगलों की कटाई हो रही है। बड़े पैमाने पर पेड़ों को काटकर जलाया जा रहा है, जिससे क्षेत्र का प्राकृतिक संतुलन प्रभावित हो रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञ मानते हैं कि घने जंगल तापमान को नियंत्रित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पेड़ वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर हवा को ठंडा बनाए रखते हैं, लेकिन जंगल कम होने से धरती की सतह तेजी से गर्म हो रही है।
अबूझमाड़ और बस्तर क्षेत्र देश की दुर्लभ जैव विविधता के लिए पहचाने जाते हैं। यहां साल, सागौन, धावड़ा, बीजा और कई औषधीय वनस्पतियां प्राकृतिक रूप से पाई जाती हैं। जंगलों की कटाई से केवल हरियाली खत्म नहीं हो रही, बल्कि वन्यजीवों का अस्तित्व भी खतरे में पड़ता जा रहा है। भालू, तेंदुआ, जंगली भैंसा, हिरण, दुर्लभ पक्षी और कई छोटे जीव अपने प्राकृतिक आवास खो रहे हैं। जंगल जलने से पक्षियों के घोंसले नष्ट हो रहे हैं और वन्यजीव आबादी वाले इलाकों की ओर भटकने लगे हैं, जिससे मानव और वन्यजीव संघर्ष बढ़ने की आशंका भी गहरा रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार बस्तर के जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि आदिवासी जीवन, संस्कृति और पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली का आधार हैं। इन जंगलों में मिलने वाली अनेक जड़ी-बूटियां स्थानीय उपचार पद्धति में उपयोग की जाती हैं। जंगल समाप्त होने से कई दुर्लभ औषधीय पौधों के विलुप्त होने का खतरा बढ़ रहा है। इसका सीधा असर भविष्य की चिकित्सा और प्राकृतिक उपचार प्रणाली पर पड़ सकता है।
बढ़ती गर्मी का प्रभाव मानव जीवन पर भी साफ दिखाई देने लगा है। लू, डिहाइड्रेशन, त्वचा रोग और सांस संबंधी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में जलस्रोत सूखने लगे हैं, जिससे पेयजल संकट गहराने की आशंका है। खेती और वन आधारित आजीविका पर निर्भर लोगों की मुश्किलें भी बढ़ सकती हैं। तापमान में लगातार वृद्धि से आने वाले वर्षों में बस्तर क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का असर और गंभीर रूप ले सकता है।
पर्यावरण जानकारों का कहना है कि यदि समय रहते जंगलों की अंधाधुंध कटाई और आगजनी पर रोक नहीं लगी, तो बस्तर और अबूझमाड़ का प्राकृतिक संतुलन तेजी से बिगड़ सकता है। वन संरक्षण, बड़े स्तर पर पौधरोपण और पारंपरिक जंगलों को बचाने के लिए स्थानीय समुदायों की भागीदारी बेहद जरूरी है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि जंगलों का विनाश केवल पर्यावरण का संकट नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व से जुड़ा बड़ा खतरा बनता जा रहा है।




