
भंगाराम माई के दरबार में लगी देवी-देवताओं की अदालत, 35 को सुनाई गई सजा
नौ परगना के देवी-देवताओं ने लगाई हाजिरी, भादो जात्रा में उमड़ा आस्था और परंपरा का सैलाब
संवाददाता – धनेन्द्र निषाद
केशकाल। कोंडागांव जिले के केशकाल में आदिम संस्कृति और लोक आस्था से जुड़ी एक अनोखी परंपरा आज भी जीवंत है। यहां भादो जात्रा के अवसर पर भंगाराम माई के दरबार में इंसानों की नहीं, बल्कि देवी-देवताओं की अदालत लगती है। क्षेत्र के नौ परगना से देवी-देवता अपने पुजारी, सिरहा, गुनिया, मांझी, चालकी और गायता-मुखिया के साथ दरबार में पहुंचते हैं।
स्थानीय मान्यता के अनुसार इस दरबार में देवी-देवताओं के सालभर के कार्यों की समीक्षा की जाती है। गांव और क्षेत्र में किसी देवी-देवता के कारण लगातार विघ्न-बाधा उत्पन्न होने की शिकायत मिलने पर परंपरागत तरीके से उसके संबंध में निर्णय लिया जाता है। इसी मान्यता के चलते इस वर्ष 35 देवी-देवताओं को सजा सुनाए जाने की बात सामने आई है।
भादो जात्रा में नौ परगना की रही मौजूदगी
केशकाल के तेलीन सती माई मंदिर के समीप टाटामारी पर्यटन मार्ग पर स्थित भंगाराम देवी के दरबार में भादो जात्रा का आयोजन हुआ। इस दौरान नौ परगना के देवी-देवता अपने पारंपरिक प्रतिनिधियों के साथ दरबार में पहुंचे।
जात्रा में बड़ी संख्या में ग्रामीण और श्रद्धालु शामिल हुए। पूरे आयोजन के दौरान पारंपरिक रीति-रिवाजों और लोक आस्था का विशेष माहौल देखने को मिला।
भंगाराम माई के दरबार में होता है पारंपरिक फैसला
स्थानीय मान्यता में भंगाराम माई का दरबार देवी-देवताओं के लिए विशेष महत्व रखता है। माना जाता है कि क्षेत्र के देवी-देवताओं के लिए यहां हाजिरी देना आवश्यक है। यदि किसी देवी-देवता के कारण गांव या क्षेत्र में किसी तरह की लगातार परेशानी या विघ्न-बाधा उत्पन्न होने की शिकायत हो तो भादो जात्रा के दौरान उसके संबंध में निर्णय लिया जाता है।
इसी वजह से स्थानीय लोग इस आयोजन को देवी-देवताओं की अदालत के रूप में देखते हैं। यहां होने वाली पूरी प्रक्रिया पारंपरिक मान्यताओं और आदिम सामाजिक व्यवस्था से जुड़ी हुई है।
35 देवी-देवताओं को सुनाई गई सजा
भंगाराम देवी समिति के सचिव नंदलाल ने बताया कि हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी नौ परगना के देवी-देवताओं ने भादो जात्रा में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। उन्होंने बताया कि गांव और क्षेत्र में विघ्न-बाधा उत्पन्न करने वाले 35 देवी-देवताओं को परंपरा के अनुसार सजा सुनाई गई।
उन्होंने बताया कि जात्रा में हजारों श्रद्धालुओं की मौजूदगी रही और पूरे आयोजन में लोगों ने पारंपरिक आस्था के साथ भाग लिया।
छह शनिवार तक चलती है विशेष पूजा और सेवा
भंगाराम देवी की भादो जात्रा भादो माह के कृष्ण पक्ष के शनिवार को आयोजित किए जाने की परंपरा है। जात्रा से पहले लगातार छह शनिवार तक विशेष पूजा-अर्चना और सेवा की जाती है। इसके बाद सातवें और अंतिम शनिवार को भादो जात्रा का आयोजन होता है।
जात्रा के दिन नौ परगना के देवी-देवताओं के साथ उनके पुजारी, सिरहा, गुनिया, मांझी और गायता-मुखिया बड़ी संख्या में भंगाराम माई के दरबार में पहुंचते हैं।
पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ होती है पूजा
भादो जात्रा के दौरान भंगाराम माई और अन्य देवी-देवताओं की पूजा स्थानीय परंपराओं के अनुसार की जाती है। फूल, पान-सुपारी और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। स्थानीय परंपरा में मुर्गा और बकरा-बकरी की बलि दिए जाने की प्रथा का भी उल्लेख मिलता है।
जात्रा के दौरान महिलाओं के दरबार में प्रवेश को लेकर भी स्थानीय परंपरा के तहत प्रतिबंध बताया जाता है। मान्यता है कि भंगाराम माई की अनुमति और स्वीकृति के बिना किसी नए देवी-देवता की पूजा शुरू नहीं की जाती।
आदिम संस्कृति और लोक आस्था का जीवंत उदाहरण
भंगाराम माई की भादो जात्रा केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बस्तर की आदिम संस्कृति, लोक आस्था और पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था की झलक भी प्रस्तुत करती है।
देवी-देवताओं की अदालत की यह परंपरा अपने आप में अनोखी है। इसे देखने और इस पारंपरिक आयोजन का हिस्सा बनने के लिए केशकाल सहित आसपास के क्षेत्रों और दूर-दराज के इलाकों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचे।
भादो जात्रा के दौरान पूरा क्षेत्र आस्था, परंपरा और लोक संस्कृति के रंग में रंगा नजर आया। भंगाराम माई का यह दरबार आज भी स्थानीय समाज की पुरानी मान्यताओं और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए है।





