
असम की त्रासदी: बाढ़ ने उजाड़ दिए सैकड़ों गांव, 75 मौतों ने उठाए आपदा प्रबंधन पर बड़े सवाल
दंडकारण्य दर्पण
गुवाहाटी, 29 जुलाई।
असम एक बार फिर भीषण बाढ़ की विभीषिका से जूझ रहा है। लगातार हुई भारी बारिश और ब्रह्मपुत्र सहित उसकी सहायक नदियों के उफान ने सैकड़ों गांवों को जलमग्न कर दिया है। अब तक 75 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि करीब 3.32 लाख लोग आज भी बाढ़ की मार झेल रहे हैं। राज्य के 763 गांव इस प्राकृतिक आपदा से प्रभावित हुए हैं। हजारों परिवारों की जिंदगी पूरी तरह बदल गई है। कई लोगों के सिर से छत छिन गई तो किसानों की महीनों की मेहनत पानी में बह गई।
गांवों में तबाही का मंजर, हर ओर सिर्फ पानी और बेबसी
बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में हालात बेहद दर्दनाक हैं। कई गांव कई दिनों तक पूरी तरह पानी में डूबे रहे। हजारों परिवारों को अपने घर छोड़कर राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ी। कई स्थानों पर सड़कें और पुल बह जाने से गांवों का संपर्क टूट गया। पेयजल, बिजली और स्वास्थ्य सेवाएं भी गंभीर रूप से प्रभावित हुई हैं। खेतों में खड़ी फसलें नष्ट हो गई हैं, जिससे किसानों के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया है।
एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, सेना और स्थानीय प्रशासन लगातार राहत एवं बचाव कार्य में जुटे हैं, लेकिन कई दूरस्थ इलाकों तक सहायता पहुंचाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
बाढ़ आई कैसे?
विशेषज्ञों के अनुसार लगातार मूसलाधार मानसूनी बारिश, ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों का खतरे के निशान से ऊपर बहना, तटबंधों पर बढ़ता दबाव और निचले इलाकों में पानी की निकासी की अपर्याप्त व्यवस्था इस बाढ़ के प्रमुख कारण रहे हैं।
क्या समय पर चेतावनी और तैयारी पर्याप्त थी?
हर साल बाढ़ की आशंका के बावजूद इतनी बड़ी जनहानि कई गंभीर सवाल खड़े करती है। लोगों तक समय पर चेतावनी पहुंची या नहीं, संवेदनशील क्षेत्रों से समय रहते सुरक्षित स्थानों पर निकासी कितनी प्रभावी रही और आपदा प्रबंधन की तैयारियां कितनी मजबूत थीं, इन सभी पहलुओं की निष्पक्ष समीक्षा जरूरी है।
हालांकि यह कहना उचित नहीं होगा कि पूरी त्रासदी केवल किसी एक विभाग या व्यक्ति की लापरवाही का परिणाम है। असम में बाढ़ का बड़ा कारण प्राकृतिक परिस्थितियां भी हैं। लेकिन यदि कहीं चेतावनी प्रणाली, राहत पहुंचाने या निकासी व्यवस्था में कमी रही है, तो उसकी जांच होनी चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं में जनहानि कम की जा सके।
पूरे देश के लिए चिंता का विषय
असम केवल एक राज्य नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर भारत की जीवनरेखा है। यहां आई बाढ़ का असर परिवहन, कृषि, व्यापार और आम जनजीवन पर भी पड़ता है। हजारों परिवारों का विस्थापन, कृषि को भारी नुकसान और सार्वजनिक संपत्तियों का विनाश देश की अर्थव्यवस्था और विकास पर भी प्रभाव डालता है। ऐसी आपदाएं यह याद दिलाती हैं कि जलवायु परिवर्तन और आपदा प्रबंधन दोनों पर गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है।
पीड़ितों के साथ खड़ा होने का समय
असम सरकार ने मृतकों के परिजनों के लिए अतिरिक्त आर्थिक सहायता की घोषणा की है और राहत एवं पुनर्वास कार्य तेज कर दिए हैं। लेकिन जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया है या जिनका सब कुछ बाढ़ में बह गया, उनके लिए आर्थिक सहायता भर पर्याप्त नहीं हो सकती। जरूरत है कि राहत, पुनर्वास और भविष्य में ऐसी त्रासदियों को कम करने के लिए दीर्घकालिक और प्रभावी उपायों को प्राथमिकता दी जाए।
असम की यह त्रासदी केवल एक राज्य का दर्द नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए चेतावनी है कि प्राकृतिक आपदाओं के प्रति तैयारी, समय पर सूचना और मजबूत आपदा प्रबंधन व्यवस्था अब पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गई है।




