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संजू त्रिपाठी हत्याकांड में बड़ा फैसला: 22 आरोपी दोषमुक्त, पुलिस की विवेचना पर उठे गंभीर सवाल

1500 पन्नों का चालान भी नहीं दिला सका सजा, साक्ष्यों की कमजोर कड़ियों और गवाहों के मुकरने से अभियोजन का पक्ष कमजोर

संजू त्रिपाठी हत्याकांड में बड़ा फैसला: 22 आरोपी दोषमुक्त, पुलिस की विवेचना पर उठे गंभीर सवाल

 

1500 पन्नों का चालान भी नहीं दिला सका सजा, साक्ष्यों की कमजोर कड़ियों और गवाहों के मुकरने से अभियोजन का पक्ष कमजोर

 संजू त्रिपाठी हत्याकांड में 22 आरोपियों की दोषमुक्ति से संबंधित बिलासपुर न्यायालय भवन
बिलासपुर न्यायालय भवन

तीन गोलियां शरीर से निकलीं, राख से छह धातु के टुकड़े मिलने का दावा; हथियारों से बैलिस्टिक मिलान और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के प्रमाणीकरण पर उठे सवाल

 

बिलासपुर। शहर के बहुचर्चित संजू त्रिपाठी हत्याकांड में जिला एवं सत्र न्यायालय के फैसले के बाद पुलिस की विवेचना और अभियोजन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इस मामले में मुख्य आरोपी बनाए गए कपिल त्रिपाठी समेत सभी 22 आरोपियों को अदालत ने दोषमुक्त कर दिया। 14 दिसंबर 2022 को सकरी बायपास स्थित मिनरल चेक पोस्ट के पास दिनदहाड़े हुई संजू त्रिपाठी की हत्या ने पूरे प्रदेश में सनसनी फैला दी थी। पुलिस ने इस हत्याकांड के पीछे पारिवारिक और पैतृक संपत्ति विवाद को कथित वजह बताते हुए हत्या की साजिश का आरोप लगाया था।

 

पुलिस ने मामले में विस्तृत विवेचना के बाद करीब 1500 पन्नों का चालान पेश किया था। आरोपियों के खिलाफ षड्यंत्र, हत्या और अलग-अलग भूमिकाओं से जुड़े आरोपों को साबित करने की कोशिश की गई, लेकिन न्यायालय में अभियोजन पक्ष आरोपियों की व्यक्तिगत भूमिका और कथित साजिश को संदेह से परे प्रमाणित नहीं कर सका। नतीजतन सभी 22 आरोपियों को संदेह का लाभ मिला।

 

इस फैसले के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि इतने चर्चित और गंभीर हत्याकांड की जांच में आखिर ऐसी कौन-सी कमियां रह गईं, जिनके चलते अभियोजन का मामला अदालत में टिक नहीं सका?

 

तीन गोलियां और राख से छह धातु के टुकड़े मिलने का दावा

 

मामले में गोली और हथियारों से जुड़े साक्ष्य विवेचना के महत्वपूर्ण पहलू थे। प्रस्तुत विवरण के अनुसार, पोस्टमार्टम के दौरान संजू त्रिपाठी के शरीर से तीन गोलियां निकाली गई थीं। वहीं अंतिम संस्कार के बाद राख से छह धातु के टुकड़े मिलने की जब्ती का भी पुलिस ने दावा किया था।

 

ऐसे में इन वस्तुओं की वैज्ञानिक जांच और उनकी आपसी कड़ियों का स्थापित होना बेहद महत्वपूर्ण था। क्या बरामद धातु के टुकड़ों की प्रकृति स्पष्ट की गई? क्या गोलियों और जब्त हथियारों के बीच निर्णायक बैलिस्टिक मिलान हुआ? उपलब्ध विवरण में हथियारों और मृतक के शरीर से प्राप्त गोलियों के बीच निर्णायक बैलिस्टिक मिलान नहीं होने की बात सामने आती है।

 

साक्ष्यों की बरामदगी, सुरक्षित अभिरक्षा, फॉरेंसिक परीक्षण और न्यायालय में प्रस्तुति की प्रक्रिया भी किसी आपराधिक मुकदमे में अहम होती है। यदि इन कड़ियों को विश्वसनीय ढंग से स्थापित नहीं किया जाए, तो बचाव पक्ष को अभियोजन के साक्ष्यों पर सवाल उठाने का अवसर मिलता है।

 

हालांकि, केवल बैलिस्टिक मिलान का अभाव अपने आप में किसी मुकदमे के विफल होने का एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता। इसके लिए न्यायालय के विस्तृत फैसले में दर्ज निष्कर्षों को देखना आवश्यक है।

 

चश्मदीद गवाहों की गवाही से कमजोर पड़ा अभियोजन

 

हत्या जैसे गंभीर मामले में प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही अभियोजन की कहानी को मजबूती दे सकती है। पुलिस ने इस प्रकरण में दो महत्वपूर्ण चश्मदीद गवाहों को सामने रखा था। लेकिन उपलब्ध विवरण के मुताबिक, एक गवाह अपने पूर्व बयान से मुकर गया, जबकि दूसरे की गवाही दर्ज नहीं हो सकी।

 

इस स्थिति में घटनास्थल पर हमलावरों की पहचान, उनकी मौजूदगी और कथित भूमिका साबित करने में अभियोजन को कठिनाई का सामना करना पड़ा।

 

इसके अलावा, जब्ती के स्वतंत्र गवाहों द्वारा पुलिस की कार्रवाई का अपेक्षित समर्थन नहीं किए जाने से भी विवेचना के दौरान तैयार साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठे। किसी गवाह के मुकरने मात्र से उसका पूरा बयान स्वतः समाप्त नहीं हो जाता, लेकिन ऐसे मामलों में अभियोजन को अन्य विश्वसनीय साक्ष्यों के सहारे आरोपों की पुष्टि करनी होती है।

 

सीसीटीवी, मोबाइल और डिजिटल साक्ष्यों पर भी सवाल

 

आज के दौर में हत्या जैसे गंभीर अपराधों की जांच में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस मामले में भी सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल कॉल डिटेल, लोकेशन और सिम कार्ड के उपयोगकर्ता से संबंधित जानकारी जांच का हिस्सा रही।

 

उपलब्ध विवरण के अनुसार, सीसीटीवी फुटेज के मूल रिकॉर्डिंग उपकरण को जब्त नहीं किए जाने और फुटेज की प्रामाणिकता को लेकर सवाल उठे। मोबाइल और लोकेशन संबंधी साक्ष्यों को भी अदालत में अपेक्षित कानूनी तरीके से प्रमाणित नहीं किया जा सका।

 

डिजिटल साक्ष्यों के मामले में उनकी प्रामाणिकता, स्रोत, सुरक्षित रखे जाने की प्रक्रिया और लागू कानूनी प्रमाणन की शर्तों का पालन आवश्यक होता है। इन प्रक्रियाओं में कमी रहने पर साक्ष्य की स्वीकार्यता अथवा उसकी प्रमाणिकता प्रभावित हो सकती है।

 

हालांकि, मूल रिकॉर्डिंग उपकरण का जब्त नहीं होना हर परिस्थिति में फुटेज को स्वतः अमान्य नहीं बनाता। इसका मूल्यांकन संबंधित साक्ष्य, प्रमाणन और न्यायालय के निष्कर्षों के आधार पर किया जाना चाहिए।

 

1500 पन्नों का चालान, फिर भी आरोप साबित क्यों नहीं हुए?

 

इस प्रकरण में पुलिस ने विस्तृत चालान प्रस्तुत कर आरोपियों के खिलाफ मजबूत मामला तैयार करने का दावा किया था। लेकिन किसी आरोपपत्र की मोटाई से अधिक महत्वपूर्ण उसमें शामिल साक्ष्यों की गुणवत्ता और उनकी कानूनी मजबूती होती है।

 

हत्या की साजिश साबित करने के लिए केवल संपत्ति विवाद या आपसी रंजिश का कथित मकसद पर्याप्त नहीं होता। अभियोजन को परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की ऐसी विश्वसनीय और जुड़ी हुई श्रृंखला प्रस्तुत करनी होती है, जिससे आरोपियों की भूमिका स्थापित हो सके और उचित संदेह की गुंजाइश न रहे।

 

न्यायालय के समक्ष मुख्य चुनौती यही थी कि आरोपित व्यक्तियों में से किसने हत्या की, किसने कथित षड्यंत्र में भाग लिया और किसकी क्या भूमिका रही। उपलब्ध विवरण के अनुसार, अभियोजन इन महत्वपूर्ण कड़ियों को पर्याप्त रूप से स्थापित नहीं कर सका।

 

तत्कालीन जांच अधिकारियों की जवाबदेही कौन तय करेगा?

 

फैसले के बाद विवेचना अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष समीक्षा की मांग का आधार बनता है। सवाल यह है कि क्या घटनास्थल से जुड़े साक्ष्यों को समय पर और वैज्ञानिक तरीके से जुटाया गया था? क्या बरामद गोलियों और धातु के टुकड़ों की जांच पर्याप्त थी? क्या हथियारों की जब्ती और उनकी अभिरक्षा की प्रक्रिया उचित थी? क्या सीसीटीवी और मोबाइल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने तथा प्रमाणित करने में जरूरी सावधानी बरती गई?

 

यदि जांच में प्रक्रियागत या पेशेवर चूक हुई है, तो उसका परीक्षण सक्षम स्तर पर किया जाना चाहिए। हालांकि, अदालत से दोषमुक्ति मिलने मात्र से किसी जांच अधिकारी की व्यक्तिगत लापरवाही या दोष स्वतः सिद्ध नहीं होता। इसके लिए स्वतंत्र समीक्षा, अभिलेखों का परीक्षण और संबंधित अधिकारियों का पक्ष भी महत्वपूर्ण होगा।

 

हत्या की घटना और आरोपियों की भूमिका, दोनों अलग-अलग प्रश्न

 

संजू त्रिपाठी की गोली लगने से हुई मौत और इस मामले में आरोपित व्यक्तियों की आपराधिक जिम्मेदारी दो अलग-अलग कानूनी प्रश्न हैं। हत्या की घटना होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि मुकदमे में नामजद प्रत्येक व्यक्ति ही उसका दोषी है।

 

अदालत में अभियोजन को यह स्थापित करना होता है कि किस आरोपी ने अपराध किया, किसने सहायता या षड्यंत्र में भूमिका निभाई और आरोपों के समर्थन में कौन से विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध हैं। प्रस्तुत विवरण के मुताबिक, हत्या, कथित आपराधिक षड्यंत्र और दुष्प्रेरण से जुड़े आरोप पर्याप्त रूप से प्रमाणित नहीं हो सके।

 

इसी आधार पर अदालत ने सभी 22 आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया। यह निर्णय अभियोजन द्वारा प्रस्तुत मामले की कानूनी विफलता को दर्शाता है, न कि अपने आप में घटना से जुड़े हर अनुत्तरित सवाल का अंतिम जवाब।

 

अब आगे क्या, फैसले की समीक्षा और जवाबदेही पर नजर

 

इस फैसले के बाद मामले में न्यायालय के विस्तृत निर्णय, विवेचना अभिलेखों और साक्ष्यों की समीक्षा महत्वपूर्ण होगी। अभियोजन पक्ष के पास लागू कानून और समयसीमा के अधीन उपलब्ध वैधानिक उपायों पर विचार करने का विकल्प हो सकता है। किसी संभावित अपील या आगे की कार्रवाई की स्थिति की पुष्टि आधिकारिक अभिलेखों से की जानी चाहिए।

 

संजू त्रिपाठी हत्याकांड ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि गंभीर अपराधों की जांच में केवल गिरफ्तारियां और लंबा चालान पर्याप्त नहीं हैं। वैज्ञानिक साक्ष्य, गवाहों का संरक्षण, डिजिटल प्रमाणों की विश्वसनीयता और जांच की निष्पक्षता ही न्यायिक प्रक्रिया को मजबूती प्रदान करती है।

 

अब निगाह इस बात पर रहेगी कि विवेचना की गुणवत्ता को लेकर उठे सवालों की कोई निष्पक्ष समीक्षा होती है या नहीं और जांच में संभावित चूकों की जिम्मेदारी तय करने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।

 

 

Bindesh Patra

युवा वहीं होता हैं, जिसके हाथों में शक्ति पैरों में गति, हृदय में ऊर्जा और आंखों में सपने होते हैं।

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