धमतरी। छत्तीसगढ़ स्वास्थ्य विभाग में सरकारी दवाओं और चिकित्सा सामग्री की सुरक्षा से लेकर एम्बुलेंस संचालन तक सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि सफाई कर्मचारी के पद पर नियुक्त एक व्यक्ति का सरकारी दवा स्टोर पर खतरनाक प्रभाव है। दवाइयां, मास्क और सैनिटाइजर जैसी सामग्री स्टोर से बाहर ले जाने और दुकानों में खपाने के खेल में माहिर खिलाड़ी पर कोई कार्रवाई नहीं होने से उसके हौसले बुलंद हैं।
स्वीपर पर सरकारी सामान बाहर ले जाने के आरोप
चर्चा है कि संबंधित कर्मचारी को उस समय के तत्कालीन सीएमएचओ ने निजी सेवा में लगा रखा था। आरोप है कि इसी प्रभाव के चलते वह अपनी निर्धारित जिम्मेदारियों से अलग स्टोर की व्यवस्था में दखल देता रहा। सरकारी सामग्री के कथित दुरुपयोग की जांच के लिए स्टॉक रजिस्टर, वितरण पंजी, खरीद-बिक्री से जुड़े रिकॉर्ड और भौतिक सत्यापन के साथ उसके आवास की भी नियमानुसार जांच की मांग उठ रही है।
सवाल यह है कि सरकारी दवाओं और चिकित्सा सामग्री की अभिरक्षा किसकी जिम्मेदारी है और निगरानी के बावजूद कथित अनियमितताएं हुईं तो जिम्मेदार अधिकारियों ने क्या किया?
एम्बुलेंस में कमीशन का खेल ?
जिले में एम्बुलेंस चालकों के लंबे समय से एक ही जगह पदस्थ रहने पर भी सवाल हैं। आरोप है कि कुछ चालक सरकारी अस्पतालों से मरीजों को निजी अस्पतालों तक पहुंचाने के बदले प्रति मरीज डेढ़ से दो हजार रुपये तक कमीशन लेते हैं। इस दावे की पुष्टि के लिए मरीजों के बयान, रेफरल रिकॉर्ड, वाहन की जीपीएस जानकारी और संबंधित अस्पतालों के रिकॉर्ड खंगालने की जरूरत है।
तबादले और जवाबदेही पर सरकार से सवाल
स्वास्थ्य विभाग में वर्षों से एक ही स्थान पर जमे कर्मचारियों के कार्यकाल, कार्य-विभाजन और शिकायतों की समीक्षा की मांग उठ रही है। सवाल है कि तबादला नीति और निगरानी व्यवस्था पर अमल क्यों नहीं हो रहा?
सरकारी अस्पतालों में दवाएं मरीजों के लिए हैं और एम्बुलेंस जरूरतमंदों की सहायता के लिए। सरकार और विभागीय अधिकारियों को आरोपों की निष्पक्ष जांच करानी चाहिए। गड़बड़ी प्रमाणित होने पर संबंधित कर्मचारियों और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए।
मनीराम के संरक्षण में नहीं होते तबादले?

स्वास्थ्य विभाग यानी जनता की सेहत से जुड़ा मामला लेकिन यहां भी एक मनीराम है जो लंबे समय से बाबू राज कर रहा है। उसके संरक्षण में ही ड्राइवरों और स्वीपर की मनमानी चरम पर है। यदि मनीराम पर सरकार लगाम कसे तो इनका भी इलाज हो सकता है। लेकिन तबादले की कार्रवाई आज तक नहीं होने से इनके हौसले बुलंद हैं और इसी वजह से ये लोग खुलेआम मनमानी कर रहे हैं।
स्वीपर को पानी सप्लाई की जिम्मेदारी दी तो कॉलोनी का माई बाप बन गया। असल में स्वीपर सूरजमुखी की तरह है। आज के भागदौड़ भरे दौर में पानी ही लोगों को काबू करने का जरिया बन गया है। इसी पानी की परेशानी का फायदा उठाकर स्वीपर ख़ुद को मोहल्ले का मालिक मान बैठा है और आसपास के लोगों को इसके नाम से जमकर प्रताड़ित करता है। ख़ुद को एक विशेष जाति का बताकर लोगों को झूठे केस में फ़साने की धमकी देता फिरता है मगर उससे उलझने के बजाय स्थानीय लोग ख़ुद का मुँह बंद कर उसके मनमानी पर आँख मूँदे बैठे हैं।
