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CG News: अबूझमाड़ में कॉफी की खुशबू से बदलेगी तस्वीर, आजीविका और पर्यावरण संरक्षण की नई पहल

नारायणपुर प्रशासन और कॉफी बोर्ड ऑफ इंडिया ने शुरू की तैयारी, वैज्ञानिक अध्ययन के बाद चयनित गांवों में चरणबद्ध तरीके से होगा कॉफी उत्पादन

 

अबूझमाड़ में कॉफी की खुशबू से बदलेगी तस्वीर, आजीविका और पर्यावरण संरक्षण की नई पहल

 

 

नारायणपुर प्रशासन और कॉफी बोर्ड ऑफ इंडिया ने शुरू की तैयारी, वैज्ञानिक अध्ययन के बाद चयनित गांवों में चरणबद्ध तरीके से होगा कॉफी उत्पादन

 

नारायणपुर। घने जंगलों, दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों और लंबे समय तक नक्सल प्रभावित क्षेत्र के रूप में पहचाने जाने वाले अबूझमाड़ में अब विकास की नई कहानी लिखने की तैयारी शुरू हो गई है। छत्तीसगढ़ सरकार की दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों में आजीविका के नए अवसर विकसित करने की पहल के तहत नारायणपुर जिला प्रशासन अबूझमाड़ में कॉफी की खेती शुरू करने की दिशा में काम कर रहा है। इसका उद्देश्य स्थानीय ग्रामीणों की आय बढ़ाना, रोजगार के अवसर सृजित करना और पर्यावरण के अनुकूल कृषि मॉडल विकसित करना है।

इसी कड़ी में कलेक्टर नम्रता जैन ने हाल ही में कॉफी बोर्ड ऑफ इंडिया के विशेषज्ञों के साथ अबूझमाड़ के कुतुल, कच्छापाल, कोडलियार, इराकभट्टी और टोके गांवों का दौरा कर क्षेत्र की भौगोलिक एवं कृषि परिस्थितियों का निरीक्षण किया। विशेषज्ञों ने जलवायु, वर्षा, तापमान, मिट्टी की गुणवत्ता और ऊंचाई का अध्ययन किया। प्रारंभिक आकलन में क्षेत्र को कॉफी उत्पादन के लिए अनुकूल पाया गया है।

 

कॉफी बोर्ड ऑफ इंडिया परियोजना के प्रत्येक चरण में तकनीकी सहयोग देगा। इसके तहत उपयुक्त भूमि का चयन, नर्सरी की स्थापना, पौधारोपण, फसल प्रबंधन, किसानों का प्रशिक्षण और वैज्ञानिक खेती की तकनीक उपलब्ध कराई जाएगी। शुरुआती चरण में नर्सरी विकसित करने और उपयुक्त भूमि चिन्हित करने का कार्य किया जाएगा।

 

विशेषज्ञों के अनुसार बस्तर संभाग की जलवायु, घने वन, उपजाऊ मिट्टी और पर्याप्त वर्षा कॉफी की खेती के लिए उपयुक्त हैं। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के अंतर्गत उद्यानिकी एवं अनुसंधान केंद्र जगदलपुर द्वारा किए गए अध्ययन में भी बस्तर को जैविक कॉफी उत्पादन के लिए संभावनाओं वाला क्षेत्र बताया गया है। वनों की छाया में होने वाली कॉफी खेती से मिट्टी संरक्षण, जैव विविधता बढ़ाने और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में भी मदद मिलेगी।

 

प्रशासन का मानना है कि कॉफी उत्पादन शुरू होने के लगभग चार वर्ष बाद किसानों को नियमित आय मिलने लगेगी। खेती के साथ-साथ नर्सरी संचालन, पौधों की देखभाल, फसल प्रबंधन, तुड़ाई और प्रसंस्करण जैसे कार्यों में भी स्थानीय स्व-सहायता समूहों और ग्रामीणों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।

 

कलेक्टर नम्रता जैन ने कहा कि प्रशासन का उद्देश्य अबूझमाड़ की प्राकृतिक विशेषताओं को आधार बनाकर टिकाऊ विकास मॉडल तैयार करना है। वैज्ञानिक तरीके से कॉफी की खेती को बढ़ावा देकर स्थानीय समुदायों को रोजगार और आय के नए अवसर उपलब्ध कराए जाएंगे, वहीं वन और पर्यावरण संरक्षण को भी प्राथमिकता दी जाएगी।

 

परियोजना के सफल संचालन के लिए जिला कृषि विभाग के अधिकारियों को ओडिशा के कोरापुट स्थित कॉफी बोर्ड के क्षेत्रीय केंद्र में विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। यहां उन्हें कॉफी की वैज्ञानिक खेती, नर्सरी प्रबंधन और फसल देखभाल की आधुनिक तकनीकों की जानकारी दी जाएगी।

 

निरीक्षण के दौरान विशेषज्ञों ने अबूझमाड़ के कुछ क्षेत्रों में चाय की खेती की संभावनाओं पर भी चर्चा की। इसके बाद कलेक्टर ने अधिकारियों को चरणबद्ध कार्ययोजना तैयार कर भविष्य में इस संभावना पर भी अध्ययन करने के निर्देश दिए हैं।

 

यदि यह पहल सफल रहती है तो अबूझमाड़ केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता और जैव विविधता के लिए ही नहीं, बल्कि उच्च गुणवत्ता वाली जैविक कॉफी के उत्पादन के लिए भी देशभर में नई पहचान बना सकता है। इससे स्थानीय आदिवासी समुदायों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी और क्षेत्र में सतत विकास का नया मॉडल स्थापित हो सकेगा।

Bindesh Patra

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