
सरकारी सड़क को कमाई का एटीएम बनाने वालों की उड़ी नींद! माइंस की गाड़ियां रोकने के लिए सियासी दबाव का खेल?
पखांजूर। सरकारी सड़कें जनता की सुविधा के लिए बनती हैं या कुछ लोगों के आर्थिक हितों का माध्यम बन जाती हैं? परलकोट के अंदरूनी इलाकों में सुरजागढ़ माइंस के वाहनों की आवाजाही को लेकर उठा विवाद अब इसी बुनियादी सवाल पर आकर टिक गया है। सड़क निर्माण, मरम्मत, रेत के कारोबार और राजनीतिक प्रभाव के बीच स्थानीय बेरोजगार युवाओं की आजीविका भी चर्चा के केंद्र में है।
सड़क निर्माण और मरम्मत के नाम पर सरकारी धन के इस्तेमाल, निर्माण गुणवत्ता तथा बार-बार होने वाले मरम्मत कार्यों को लेकर क्षेत्र में सवाल उठते रहे हैं। आरोपों और चर्चाओं के बीच अब यह जानना जरूरी हो गया है कि आखिर सरकारी सड़कों की वास्तविक स्थिति, निर्माण लागत और मरम्मत का पूरा हिसाब क्या है।
सड़क निर्माण से मरम्मत तक, सरकारी धन का हिसाब कौन देगा?
सड़क निर्माण का ठेका, कुछ समय बाद मरम्मत की जरूरत और फिर नए सिरे से सरकारी धन का इस्तेमाल। यदि किसी सड़क के साथ ऐसा बार-बार हो रहा है तो उसकी गुणवत्ता, निर्माण एजेंसी और जिम्मेदारी तय होना जरूरी है। जनता को बेहतर सड़क के बजाय बार-बार बदहाली झेलनी पड़े और सरकारी धन खर्च होता रहे, तो यह व्यवस्था की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
परलकोट के अंदरूनी क्षेत्रों में सड़क निर्माण कार्यों, मरम्मत और कोटरी जैसी नदियों से निर्माण कार्यों के लिए रेत निकासी को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। इन कार्यों की वास्तविक लागत, स्वीकृति, भुगतान और वैधानिकता की जांच से ही तस्वीर स्पष्ट होगी।
माइंस की गाड़ियों को रोकने के विवाद में आर्थिक हितों की चर्चा
चर्चा है कि कथित आर्थिक हित पूरे नहीं होने से नाराज एक राजनीतिक व्यक्ति और उसके समर्थकों ने हाल ही में माइंस के वाहनों को रोकने की कोशिश की। इस दौरान लोगों के साथ धक्का-मुक्की, गाली-गलौज और बदसलूकी किए जाने के आरोप भी सामने आए हैं। घटनाक्रम से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित होने की बात कही जा रही है।
हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि, संबंधित पक्षों का पक्ष और प्रशासनिक जांच का निष्कर्ष सामने आना आवश्यक है। केवल सोशल मीडिया वीडियो या स्थानीय चर्चाओं के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।
लेकिन सवाल अपनी जगह कायम है कि यदि विवाद सड़क, परिवहन या किसी कारोबारी हित को लेकर है, तो उसका समाधान कानून और प्रशासनिक प्रक्रिया से होना चाहिए या सड़क पर दबाव बनाकर?
कंपनी ने अपने खर्च पर सड़क सुधारी तो क्यों उठे सवाल?
सुरजागढ़ माइंस से जुड़े वाहनों के संचालन के बाद कंपनी द्वारा महाराष्ट्र से छत्तीसगढ़ तक परिवहन मार्गों पर अपने खर्च से सड़क मरम्मत कराए जाने की जानकारी सामने आई है। जिन मार्गों की बदहाली लंबे समय से परेशानी का कारण रही, वहां मरम्मत की पहल को सड़क उपयोगकर्ताओं की सुविधा के नजरिए से भी देखा जा रहा है।
ऐसे में यह स्पष्ट होना चाहिए कि मरम्मत किन सड़कों पर हुई, कार्य किस एजेंसी ने किया, किन तकनीकी मानकों का पालन किया गया और संबंधित विभाग की अनुमति या निगरानी की क्या व्यवस्था रही।
यदि निजी कंपनी अपने खर्च पर सार्वजनिक उपयोग की सड़क सुधारती है, तो पारदर्शिता और नियमों के तहत उसका स्वागत किया जाना चाहिए। वहीं, इससे सरकारी ठेकों से जुड़े किसी व्यक्ति के आर्थिक हित प्रभावित होने का आरोप है, तो उसकी पुष्टि दस्तावेजों और तथ्यों से होनी चाहिए।
सवाल सीधा है। सड़क जनता के लिए सुधरेगी या सड़क मरम्मत को लेकर होने वाले आर्थिक हितों की खींचतान में जनता फिर पीछे रह जाएगी?
दुकान की मेहरबानी और राजनीतिक वफादारी का कथित कनेक्शन
इस विवाद में ठेकेदारी और राजनीतिक संबंधों को लेकर भी चर्चाएं सामने आ रही हैं। आरोप लगाया जा रहा है कि एक ठेकेदार की ओर से दुकान उपलब्ध कराकर एक राजनीतिक व्यक्ति को उपकृत किया गया और बदले में सड़क मरम्मत तथा माइंस वाहनों के मुद्दे पर उसका समर्थन मिलने की चर्चा है।
यह गंभीर आरोप है, जिसकी पुष्टि के लिए दस्तावेज, संबंधित पक्षों के बयान और अन्य स्वतंत्र साक्ष्य जरूरी हैं। बिना प्रमाण किसी संबंध को भ्रष्टाचार या अनुचित लेन-देन का निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।
फिर भी सार्वजनिक जीवन में हितों के टकराव का सवाल महत्वपूर्ण है। यदि किसी राजनीतिक व्यक्ति का किसी कारोबारी हित से संबंध है, तो क्या सार्वजनिक मुद्दों पर उसकी भूमिका पारदर्शी है? जनता को इस सवाल का तथ्यात्मक जवाब मिलना चाहिए।
सरकार-सरकार भाई-भाई, मिलकर मलाई खाई?
सरकारी सड़क पर माइंस के वाहन चलें तो विरोध, कंपनी सड़क सुधरवाए तो सवाल और स्थानीय युवाओं को रोजगार मिले तो उनके भविष्य पर भी अनिश्चितता। आखिर इस पूरे विवाद में जनहित की प्राथमिकता क्या है?
यदि भारी वाहनों से सड़क को नुकसान पहुंच रहा है, तो भार क्षमता, परिवहन नियमों, सड़क सुरक्षा और मरम्मत की जवाबदेही तय होनी चाहिए। आवश्यकता होने पर संबंधित विभाग नियमानुसार कार्रवाई करे। लेकिन सड़क की समस्या को आधार बनाकर किसी भी पक्ष द्वारा मनमाने तरीके से परिवहन बाधित करना समाधान नहीं हो सकता।
सरकारी सड़क किसी ठेकेदार, राजनीतिक व्यक्ति या निजी समूह की संपत्ति नहीं है। उसका उपयोग और नियंत्रण कानून, निर्धारित नियमों और सक्षम प्राधिकरण के निर्णयों के अनुसार होना चाहिए।
ठेकेदारी की लड़ाई में बेरोजगार नौजवान क्यों पिसें?
सुरजागढ़ माइंस से जुड़े परिवहन और अन्य कार्यों में आसपास के युवाओं को रोजगार मिलने की बात कही जा रही है। इनमें ऐसे परिवार भी हो सकते हैं जिनकी आजीविका इन कामों पर निर्भर है। दिव्यांग युवाओं को रोजगार के अवसर मिलने का दावा भी इस बहस को सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाता है।
बस्तर और परलकोट के अनेक इलाकों में रोजगार के अवसर बढ़ाना एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में यदि किसी विवाद के चलते कामकाज प्रभावित होता है, तो उसका असर उन परिवारों पर पड़ सकता है जो रोज कमाकर अपना घर चलाते हैं।
विकास का अर्थ केवल सड़क, खदान या परिवहन नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए सम्मानजनक और सुरक्षित रोजगार भी है। रोजगार के अवसरों में स्थानीय युवाओं को नियमानुसार प्राथमिकता, श्रमिकों की सुरक्षा और उचित भुगतान सुनिश्चित होना चाहिए।
जो लोग माइंस वाहनों के संचालन का विरोध कर रहे हैं, उनकी आपत्तियों को भी तथ्यों के आधार पर सुना जाना चाहिए। लेकिन किसी भी फैसले में श्रमिकों और बेरोजगार युवाओं की आजीविका की अनदेखी नहीं होनी चाहिए।
प्रशासन खोले सड़क निर्माण और ठेकेदारी का पूरा हिसाब
अब प्रशासन और संबंधित विभागों के सामने कई महत्वपूर्ण सवाल हैं।
किस सड़क का निर्माण कब हुआ और कितनी लागत आई? निर्माण एजेंसी कौन थी? सड़क की निर्धारित आयु और गुणवत्ता के मानक क्या थे? सड़क समय से पहले खराब हुई तो जिम्मेदारी किसकी तय की गई? कितनी बार मरम्मत हुई और उस पर कितना सरकारी धन खर्च हुआ?
इसी तरह रेत उत्खनन, परिवहन, स्वीकृति और रॉयल्टी से जुड़े रिकॉर्ड भी जांच के दायरे में आने चाहिए। माइंस परिवहन मार्गों पर भारी वाहनों की भार क्षमता, सड़क सुरक्षा और मरम्मत के खर्च की जिम्मेदारी भी स्पष्ट होनी चाहिए।
प्रशासन यदि इन तथ्यों को सार्वजनिक करता है, तो अफवाहों, आरोप-प्रत्यारोप और राजनीतिक दबाव की स्थिति को कम करने में मदद मिल सकती है।
परलकोट को ठेकेदारी का साम्राज्य नहीं, विकास चाहिए
यह विवाद केवल सुरजागढ़ माइंस के वाहनों के आवागमन का नहीं, बल्कि सार्वजनिक संसाधनों के इस्तेमाल, जवाबदेही और स्थानीय रोजगार के भविष्य का सवाल है।
सरकारी सड़क जनता की सुविधा के लिए है। सरकारी धन जनता की गाढ़ी कमाई से आता है। स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर मिलना भी विकास की महत्वपूर्ण कसौटी है।
किसी ठेकेदार को सरकारी खजाने को अपनी कमाई का एटीएम बनाने का अधिकार नहीं है। उसी तरह किसी राजनीतिक रसूखदार को निजी प्रभाव के जरिए सार्वजनिक परिवहन या रोजगार में मनमानी बाधा खड़ी करने का अधिकार नहीं मिल सकता।
अब जरूरत है आरोपों से आगे बढ़कर निष्पक्ष जांच, पारदर्शी दस्तावेजों और जवाबदेही की। परलकोट को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें सड़कें मजबूत हों, सरकारी धन का सदुपयोग हो और स्थानीय परिवारों की रोजी-रोटी सुरक्षित रहे।
आखिर सड़क जनता की है, तो उसका हिसाब भी जनता को मिलना चाहिए।
डिस्क्लेमर: इस आलेख में व्यक्त आरोप, चर्चाएं और सवाल स्वतंत्र रूप से सत्यापित निष्कर्ष नहीं हैं। संबंधित व्यक्तियों एवं पक्षों का पक्ष तथा आधिकारिक अभिलेख सामने आने पर ही तथ्यों की पूरी स्थिति स्पष्ट होगी। आलेख में प्रयुक्त ‘सरकार’ शब्द को पढ़ते समय पाठक अपनी समझ और विवेक का इस्तेमाल करें। हर जगह इसका अर्थ शासन चलाने वाली व्यवस्था या सत्ता के गलियारों से जोड़ना आवश्यक नहीं है।
दण्डकारण्य दर्पण सच के साथ, समाज के साथ।