देश के लिए शहीद हुए दीपक भारद्वाज, गांव में अपनी प्रतिमा के अनावरण का इंतजार; बदहाली पर उठे सवाल

कीर्ति चक्र विजेता शहीद उप निरीक्षक की प्रतिमा के रखरखाव और अनावरण को लेकर सवाल; शहादत के समय श्रद्धांजलि देने वालों की आज की खामोशी पर उठ रहे सवाल

देश के लिए शहीद हुए दीपक भारद्वाज, गांव में अपनी प्रतिमा के अनावरण का इंतजार; बदहाली पर उठे सवाल

 

कीर्ति चक्र विजेता शहीद उप निरीक्षक की प्रतिमा के रखरखाव और अनावरण को लेकर सवाल; शहादत के समय श्रद्धांजलि देने वालों की आज की खामोशी पर उठ रहे सवाल

संवादाता – अंकुर तिवारी

पिहरीद, जिला जांजगीर-चांपा। शहीदों के सम्मान में बड़े-बड़े भाषण देना, श्रद्धांजलि सभाओं में फूल-मालाएं चढ़ाना और शहादत के समय परिवार के बीच पहुंचकर संवेदनाएं व्यक्त करना आसान है, लेकिन शहीदों की स्मृतियों को लंबे समय तक सहेजकर रखना भी उतना ही जरूरी है। जांजगीर-चांपा जिले के पिहरीद गांव में शहीद उप निरीक्षक दीपक भारद्वाज की प्रतिमा को लेकर सामने आई स्थिति ने इसी जिम्मेदारी पर सवाल खड़े किए हैं।

शहीद दीपक भारद्वाज की प्रतिमा, पिहरीद

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, गांव में शहीद दीपक भारद्वाज की प्रतिमा स्थापित की गई है, लेकिन उसका विधिवत अनावरण अब तक नहीं हो पाया है। प्रतिमा के रखरखाव और देखरेख को लेकर भी चिंता जताई जा रही है। जिस वीर जवान के अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान को देश ने सम्मान दिया, उनकी स्मृति से जुड़े स्मारक की स्थिति अब गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

 

राष्ट्रपति भवन में मिला कीर्ति चक्र, गांव में सम्मान का इंतजार

 

3 अप्रैल 2021 को छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के तर्रेम-टेकुलगुड़ा क्षेत्र में नक्सलियों के साथ हुई भीषण मुठभेड़ में शहीद दीपक भारद्वाज ने अदम्य साहस और वीरता का परिचय दिया था। मुठभेड़ के दौरान अपने साथियों की जान बचाने के प्रयास में उन्होंने सर्वोच्च बलिदान दिया।

 

उनके शौर्य और बलिदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत देश के दूसरे सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार कीर्ति चक्र से सम्मानित किया। 9 मई 2023 को राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने उनकी पत्नी प्रांतिका भारद्वाज को यह सम्मान प्रदान किया था।

 

यह सम्मान पिहरीद गांव सहित पूरे छत्तीसगढ़ के लिए गौरव का विषय है। लेकिन आज उनकी प्रतिमा के अनावरण और रखरखाव को लेकर उठ रहे सवाल यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि शहीदों के सम्मान की परंपरा को जमीन पर कितना निभाया जा रहा है।

 

शहादत के समय श्रद्धांजलि, अब जिम्मेदारी से दूरी क्यों?

 

शहीदों के बलिदान के बाद जनप्रतिनिधियों और जिम्मेदार लोगों की ओर से श्रद्धांजलि, संवेदना और सम्मान के अनेक संदेश सामने आते हैं। लेकिन शहीदों की स्मृतियों को सुरक्षित रखने और उनके सम्मान से जुड़े कार्यों को पूरा करने की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

 

पिहरीद में शहीद दीपक भारद्वाज की प्रतिमा को लेकर यही सवाल उठ रहा है कि आखिर इसके विधिवत अनावरण और नियमित देखरेख की जिम्मेदारी किसकी है? क्या संबंधित जनप्रतिनिधियों, प्रशासन और जिम्मेदार संस्थाओं ने प्रतिमा की वर्तमान स्थिति का निरीक्षण किया है? यदि प्रतिमा की स्थापना के बाद से अनावरण लंबित है, तो इसकी वजह क्या है और इसे पूरा करने की समयसीमा क्या होगी?

 

इन सवालों पर संबंधित पक्षों की स्पष्ट जानकारी सामने आना जरूरी है, ताकि स्थिति और जिम्मेदारी दोनों स्पष्ट हो सकें।

 

शहीदों का सम्मान केवल समारोहों तक सीमित न रहे

 

शहीदों की स्मृतियां केवल प्रतिमाओं या स्मारकों तक सीमित नहीं होतीं। वे आने वाली पीढ़ियों को देशसेवा, साहस, कर्तव्य और त्याग की प्रेरणा देती हैं। ऐसे स्मारकों का संरक्षण समाज और प्रशासन की साझा जिम्मेदारी है।

 

शहीद के नाम पर आयोजित श्रद्धांजलि कार्यक्रम तभी सार्थक होंगे, जब उनकी स्मृतियों को संजोने के लिए भी निरंतर प्रयास किए जाएं। प्रतिमा का सम्मानजनक अनावरण, परिसर की साफ-सफाई, आवश्यक मरम्मत और नियमित रखरखाव जैसी व्यवस्थाएं सुनिश्चित करना जरूरी है।

 

अब जिम्मेदारों से ठोस पहल की उम्मीद

 

पिहरीद में शहीद दीपक भारद्वाज की प्रतिमा को लेकर उठ रहे सवालों के बीच अब अपेक्षा है कि संबंधित प्रशासन, स्थानीय जनप्रतिनिधि और जिम्मेदार संस्थाएं मामले का संज्ञान लें। प्रतिमा की वास्तविक स्थिति का निरीक्षण कर आवश्यक सुधार कराए जाएं और विधिवत अनावरण के लिए स्पष्ट पहल की जाए।

 

साथ ही शहीद परिवार की भावनाओं का सम्मान करते हुए उनसे संवाद किया जाना चाहिए, ताकि उनकी अपेक्षाओं और सुझावों को भी महत्व मिल सके।

 

शहीद दीपक भारद्वाज ने देश की सुरक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित किया। उनका बलिदान किसी राजनीतिक मंच या आयोजन तक सीमित नहीं है। उनके सम्मान को जीवित रखना समाज और व्यवस्था दोनों की जिम्मेदारी है।

 

शहादत के समय श्रद्धांजलि देने के साथ, वर्षों बाद भी शहीदों की विरासत को संभालना ही सच्चे सम्मान की पहचान है।

 

दण्डकारण्य दर्पण न्यूज पोर्टल सच के साथ, समाज के साथ

Exit mobile version