राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने की बस्तर दशहरा की सराहना, मांझियों का मानदेय बढ़कर 5 हजार और चालकी का 3500 रुपये

मुरिया दरबार को बताया लोकतांत्रिक मूल्यों का जीवंत उदाहरण, जनजातीय संस्कृति और सामाजिक समरसता की प्रशंसा; मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय बोले- माओवाद से मुक्त बस्तर में अब नवनिर्माण और विकास की बारी

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने की बस्तर दशहरा की सराहना, मांझियों का मानदेय बढ़कर 5 हजार और चालकी का 3500 रुपये

 

मुरिया दरबार को बताया लोकतांत्रिक मूल्यों का जीवंत उदाहरण, जनजातीय संस्कृति और सामाजिक समरसता की प्रशंसा; मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय बोले- माओवाद से मुक्त बस्तर में अब नवनिर्माण और विकास की बारी

बस्तर दशहरा उत्सव में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु

जगदलपुर/रायपुर, 23 अक्टूबर 2026। छत्तीसगढ़ की जनजातीय संस्कृति, सामूहिक आस्था और ऐतिहासिक परंपराओं के प्रतीक विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा उत्सव में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु शामिल हुईं। जगदलपुर में आयोजित इस भव्य आयोजन में राष्ट्रपति ने बस्तर दशहरा की अनूठी धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं की सराहना करते हुए इसे सामाजिक समरसता, सामूहिक सहभागिता और लोकतांत्रिक मूल्यों का जीवंत प्रतीक बताया। वहीं मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि हिंसक माओवाद से मुक्त बस्तर अब नवनिर्माण और विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

 

इस अवसर पर बस्तर की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने वाले परंपरागत प्रतिनिधियों के सम्मान में मांझियों का मासिक मानदेय 2,000 रुपये से बढ़ाकर 5,000 रुपये और चालकी का मानदेय 1,500 रुपये से बढ़ाकर 3,500 रुपये किए जाने की जानकारी दी गई। यह निर्णय बस्तर की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था से जुड़े प्रतिनिधियों के योगदान को सम्मान देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

 

75 दिनों का उत्सव, एकता और परंपरा का संदेश

 

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने मां दंतेश्वरी को नमन करते हुए कहा कि बस्तर दशहरा में शामिल होना उनके लिए विशेष प्रसन्नता का विषय है। लगभग 75 दिनों तक चलने वाला यह उत्सव विभिन्न समुदायों को एक सूत्र में बांधता है और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं को जीवित रखने का उत्कृष्ट उदाहरण है।

 

उन्होंने कहा कि बस्तर दशहरा की सबसे बड़ी विशेषता इसमें समाज के विभिन्न वर्गों, गोत्रों और समुदायों की सक्रिय भागीदारी है। रथ निर्माण, रथ खींचने, पूजा-अर्चना और विभिन्न अनुष्ठानों में अलग-अलग समुदाय अपनी पारंपरिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हैं। यही सहभागिता सामाजिक एकता, आपसी सहयोग और सांस्कृतिक निरंतरता को मजबूत बनाती है।

 

मुरिया दरबार में दिखती है लोकतंत्र की जमीनी तस्वीर

 

राष्ट्रपति ने बस्तर दशहरा के अंतर्गत आयोजित मुरिया दरबार की परंपरा को जमीनी स्तर पर लोकतांत्रिक व्यवस्था का उत्कृष्ट उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि इस परंपरा में समाज के विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधि एक साथ बैठकर जनसमस्याओं, जरूरतों और सामाजिक विषयों पर चर्चा करते हैं।

 

सामूहिक संवाद के माध्यम से समाधान तलाशने की यह परंपरा भारतीय लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने वाली है। राष्ट्रपति के अनुसार, समाज की खुशहाली और आपसी सहयोग के लिए संवाद तथा सहभागिता अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

 

राज्यपाल रमेन डेका ने भी कहा कि बस्तर दशहरा समाज को साथ लेकर चलने की सीख देता है। रथ के लिए लकड़ी जुटाने से लेकर निर्माण और संचालन तक विभिन्न गांवों के लोग अपनी जिम्मेदारियां निभाते हैं। राजशाही समाप्त होने के बाद भी यह परंपरा निरंतर जारी रही और जनतांत्रिक संवाद के प्रभावी मंच के रूप में विकसित हुई।

 

जनजातीय प्रतिभाओं को अवसर देने पर जोर

 

राष्ट्रपति ने कहा कि जनजातीय समाज में अपार प्रतिभा और संभावनाएं हैं। उचित अवसर, प्रोत्साहन और संसाधन उपलब्ध होने पर जनजातीय समाज के बेटे-बेटियां जीवन के हर क्षेत्र में देश का गौरव बढ़ा सकते हैं।

 

उन्होंने बस्तर ओलंपिक में युवाओं की उत्साहपूर्ण भागीदारी की सराहना करते हुए कहा कि खेल प्रतिभाओं को उचित मंच मिलने से बस्तर के युवा भविष्य में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना सकते हैं और ओलंपिक जैसे प्रतिष्ठित आयोजनों में देश के लिए पदक जीतने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

 

राष्ट्रपति ने बस्तर पंडुम जैसे आयोजनों को भी महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने उल्लेख किया कि बस्तर के प्रतिनिधिमंडल, बस्तर पंडुम के विजेताओं और परगना मांझी-चालकी से राष्ट्रपति भवन में मुलाकात हुई थी। ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, रीति-रिवाजों और परंपराओं से जोड़ने में मदद करते हैं।

 

माओवाद से मुक्त बस्तर में विकास का नया रोडमैप

 

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने राष्ट्रपति का स्वागत करते हुए कहा कि उनकी उपस्थिति से बस्तरवासियों का उत्साह बढ़ा है। उन्होंने कहा कि बस्तर दशहरा जनजातीय संस्कृति, समतामूलक विचारों और सामूहिक सहभागिता की सुंदर अभिव्यक्ति है।

 

मुख्यमंत्री ने कहा कि बस्तर हिंसक माओवाद से मुक्त होकर नवनिर्माण की दिशा में आगे बढ़ रहा है। बस्तर पंडुम और बस्तर ओलंपिक जैसे आयोजन इस परिवर्तन को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। बस्तर की कला, संस्कृति और परंपराओं को देश-दुनिया तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।

 

उन्होंने बताया कि नियद नेल्लानार योजना के माध्यम से दूरस्थ क्षेत्रों तक शासकीय योजनाओं का लाभ पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और पीएम-जनमन के तहत अंदरूनी बसाहटों को सड़क मार्ग से जोड़ने के कार्य किए जा रहे हैं। सड़क संपर्क बढ़ने के साथ मुख्यमंत्री ग्रामीण बस योजना के जरिए परिवहन सुविधाओं के विस्तार पर भी जोर दिया जा रहा है।

 

रेल, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा से बदलेगा बस्तर

 

मुख्यमंत्री ने बस्तर में बुनियादी सुविधाओं के विस्तार का उल्लेख करते हुए कहा कि रायपुर से रावघाट तक नई रेल सेवा शुरू की गई है और रावघाट-जगदलपुर रेल लाइन पर काम जारी है। रायपुर से विशाखापट्टनम एक्सप्रेसवे का बड़ा हिस्सा बस्तर क्षेत्र से गुजरता है।

 

पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए होम-स्टे व्यवस्था के विशेष प्रावधान किए गए हैं। वन धन केंद्रों के माध्यम से वनोपज संग्राहकों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने के प्रयास किए जा रहे हैं।

 

स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में जगदलपुर में सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल तथा गीदम में मेडिकल कॉलेज की शुरुआत का भी उल्लेख किया गया। मुख्यमंत्री ने बताया कि ओरछा और जगरगुंडा में एजुकेशन सिटी विकसित करने का कार्य किया जा रहा है। सरकार का लक्ष्य बस्तर को विकास के नए अवसरों से जोड़ना है।

 

दंडकारण्य की स्मृतियों से जुड़ी है बस्तर की पहचान

 

राष्ट्रपति ने बस्तर के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि रामायण में इस अंचल का संबंध दंडकारण्य से जोड़ा जाता है। भगवान श्रीराम के वनवास और माता शबरी से जुड़े प्रसंग क्षेत्र की सांस्कृतिक स्मृतियों का हिस्सा हैं।

 

उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम के आदर्शों, माता सीता की मर्यादा और माता शबरी की भक्ति से प्रेरणा लेकर समाज को नैतिकता और मानवीय मूल्यों को अपनाना चाहिए। जनजातीय सांस्कृतिक विरासत भारतीय परंपरा का अभिन्न अंग है और उसका संरक्षण सभी की जिम्मेदारी है।

 

प्रकृति संरक्षण जनजातीय जीवन दर्शन का हिस्सा

 

राष्ट्रपति ने जनजातीय समाज की प्रकृति पूजा की परंपरा की प्रशंसा करते हुए कहा कि जंगल, पहाड़, पेड़-पौधे और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति सम्मान इस समाज की विशिष्ट पहचान है।

 

उन्होंने कहा कि प्रकृति हमें जल, भोजन, औषधियां और जीवन के लिए आवश्यक संसाधन प्रदान करती है। इसलिए केवल प्रकृति की पूजा करना ही नहीं, बल्कि उसका संरक्षण और संवर्धन करना भी जरूरी है। वनों की रक्षा और पौधरोपण भविष्य की पीढ़ियों के लिए महत्वपूर्ण है।

 

मांझी-चालकी के सम्मान से परंपराओं को मिलेगा संबल

 

संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने कहा कि बस्तर दशहरा अपनी अवधि, विशिष्ट परंपराओं और व्यापक जनभागीदारी के कारण अलग पहचान रखता है। यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि बस्तर की जीवंत सांस्कृतिक पहचान है।

 

उन्होंने बताया कि मांझियों का मासिक मानदेय 2,000 रुपये से बढ़ाकर 5,000 रुपये तथा चालकी का मानदेय 1,500 रुपये से बढ़ाकर 3,500 रुपये किया गया है। इस निर्णय को परंपरागत प्रतिनिधियों के योगदान के प्रति सम्मान की अभिव्यक्ति बताया गया।

 

राष्ट्रपति ने बस्तर दशहरा की आगामी परंपराओं का उल्लेख करते हुए कुटुम्ब जात्रा और 27 अक्टूबर को मां दंतेश्वरी तथा देवी मावली की डोली विदाई जैसे आयोजनों को उत्सव की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान बताया। उन्होंने बस्तरवासियों के उज्ज्वल भविष्य और छत्तीसगढ़ की प्रगति की कामना की।

 

कार्यक्रम में उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा, वन मंत्री केदार कश्यप, कृषि मंत्री रामविचार नेताम, शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव, महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े, सांसद महेश कश्यप, सांसद भोजराज नाग, विधायक किरण सिंह देव, विधायक लता उसेंडी सहित अनेक जनप्रतिनिधि, प्रशासनिक अधिकारी, पारंपरिक मांझी-चालकी, कलाकार और बड़ी संख्या में नागरिक उपस्थित रहे।

 

बस्तर दशहरा की यह सांस्कृतिक विरासत एक बार फिर संदेश देती है कि परंपरा, संवाद, प्रकृति के प्रति सम्मान और सामूहिक सहभागिता से समाज की मजबूती का रास्ता निकलता है। अब इस विरासत के साथ विकास के अवसरों को गांव-गांव तक पहुंचाना बस्तर के भविष्य की बड़ी चुनौती और उम्मीद दोनों है।

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