
आदिवासी अंचल की सड़कों की गुणवत्ता पर सवाल, जांच के बाद भी कार्रवाई का इंतजार?
कांकेर। छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के कोयलीबेड़ा क्षेत्र में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के तहत बन रही सड़कों की गुणवत्ता, निर्माण कार्यों की प्रगति और विभागीय जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। घने जंगलों और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के बीच रहने वाले आदिवासी ग्रामीणों के लिए सड़क केवल आवागमन का साधन नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और रोजगार तक पहुंचने का महत्वपूर्ण माध्यम है। ऐसे में सड़क निर्माण में कथित अनियमितताओं और अधूरे कार्यों की शिकायतें ग्रामीण विकास की वास्तविक स्थिति पर सवाल खड़े करती हैं।
Caption: सड़क और पुलिया निर्माण की गुणवत्ता को लेकर जांच रिपोर्ट तथा विभागीय जवाबदेही पर सवाल।
उपलब्ध कराई गई शिकायत एवं निरीक्षण संबंधी जानकारी के अनुसार, कंदाड़ी-ब्रेहबेड़ा और रामकृष्णपुर-रूपनगर सड़क मार्गों पर निर्माण गुणवत्ता को लेकर कमियां सामने आने का दावा किया गया है। इन मामलों में विभागीय जांच, सुधारात्मक कार्रवाई और जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही को लेकर स्थिति स्पष्ट होना जरूरी है।
माओवादी प्रभावित क्षेत्र का हवाला, लेकिन जवाबदेही भी जरूरी
कोयलीबेड़ा जैसे दुर्गम क्षेत्रों में सड़क निर्माण करना निश्चित रूप से चुनौतीपूर्ण है। सुरक्षा संबंधी परिस्थितियां, परिवहन की कठिनाइयां और निर्माण सामग्री की उपलब्धता परियोजनाओं को प्रभावित कर सकती हैं। लेकिन इन चुनौतियों के बावजूद निर्माण कार्य की गुणवत्ता, स्वीकृत मानकों का पालन और सार्वजनिक धन का उचित उपयोग सुनिश्चित करना संबंधित विभाग की जिम्मेदारी है।
स्थानीय स्तर पर यदि घटिया निर्माण, सड़क के क्षतिग्रस्त होने या काम अधूरा रहने की शिकायतें सामने आती हैं, तो केवल क्षेत्र की कठिन परिस्थितियों का हवाला देना पर्याप्त नहीं होगा। संबंधित विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि निर्माण में निर्धारित गुणवत्ता मानकों का पालन हुआ या नहीं और किसी कमी के लिए जिम्मेदारी किसकी बनती है।
आदिवासी बहुल क्षेत्रों में सड़क निर्माण का उद्देश्य ग्रामीणों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराना है। यदि निर्माण के कुछ ही समय बाद सड़क क्षतिग्रस्त होती है, तो इससे सरकारी खर्च की उपयोगिता और निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
कंदाड़ी-ब्रेहबेड़ा मार्ग: पुलिया निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल
प्राप्त जानकारी के अनुसार, कंदाड़ी से ब्रेहबेड़ा तक लगभग 6 किलोमीटर लंबे सड़क मार्ग की 9 फरवरी 2026 को हुई जांच में पुलिया के एबटमेंट यानी सहायक संरचना के कंक्रीट में कमियां पाए जाने का उल्लेख है। रिपोर्ट संबंधी विवरण में कंक्रीट के भीतर खाली जगहों और हनीकॉम्बिंग जैसी खामियों की बात कही गई है।
निर्माण की ऐसी कमियां सामने आने पर यह जानना आवश्यक है कि संबंधित अधिकारियों ने तकनीकी मानकों के अनुसार उनका मूल्यांकन कराया या नहीं। साथ ही, दोषपूर्ण हिस्सों को ठीक करने, निर्माण की मजबूती सुनिश्चित करने और भविष्य में संभावित नुकसान रोकने के लिए क्या कार्रवाई की गई, इसका विवरण भी सार्वजनिक होना चाहिए।
इस सड़क का काम अब तक अधूरा होने की बात भी सामने आई है। संबंधित ठेकेदार मेसर्स टेक्नो कंस्ट्रक्शन के टेंडर रद्द होने का दावा किया गया है। हालांकि, टेंडर निरस्तीकरण की आधिकारिक स्थिति, कार्य की वर्तमान प्रगति और शेष निर्माण पूरा करने की समय-सीमा की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
रामकृष्णपुर-रूपनगर सड़क: डामरीकरण की गुणवत्ता पर सवाल
रामकृष्णपुर से रूपनगर तक लगभग 3.15 किलोमीटर लंबे सड़क मार्ग के निरीक्षण में डामरीकरण की गुणवत्ता पर सवाल उठाए जाने की जानकारी दी गई है। शिकायत संबंधी विवरण में निर्माण कार्य को गुणवत्ताहीन बताए जाने का दावा किया गया है।
यदि निरीक्षण में वास्तव में निर्धारित मानकों से संबंधित कमियां दर्ज की गई थीं, तो यह जानना महत्वपूर्ण है कि उनके आधार पर क्या तकनीकी परीक्षण किए गए और सुधार के लिए क्या निर्देश जारी हुए। केवल मौखिक समझाइश या सतही सुधार से सड़क की दीर्घकालिक मजबूती सुनिश्चित नहीं हो सकती। इसके लिए आवश्यकतानुसार तकनीकी परीक्षण, लिखित अनुपालन रिपोर्ट और पुनः निरीक्षण जरूरी हैं।
शुरुआती जांच और बाद की रिपोर्ट के बीच क्या है स्थिति?
शिकायतकर्ता की ओर से उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार, शुरुआती निरीक्षण में कमियां दर्ज होने के बाद राष्ट्रीय गुणवत्ता मॉनिटर (NQM) की ओर से हैमर टेस्ट सहित जांच किए जाने और बाद में निर्माण की स्थिति संतोषजनक बताए जाने का दावा है।
इस मामले में जांच की तारीख, परीक्षण का पूरा विवरण, जांचे गए स्थानों की संख्या और अंतिम रिपोर्ट के निष्कर्ष सामने आना आवश्यक है। हैमर टेस्ट कंक्रीट की सतही कठोरता का आकलन करने में मदद करता है, लेकिन अकेले इस परीक्षण से हर प्रकार की संरचनात्मक कमी का निर्णायक निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। परीक्षण के परिणामों को संबंधित तकनीकी मानकों और जरूरत के अनुसार अन्य जांचों के साथ देखना चाहिए।
यह भी आरोप लगाया गया है कि बारिश के दौरान लगभग 150 मीटर सड़क क्षतिग्रस्त होकर बह गई। इस दावे की पुष्टि के लिए प्रभावित हिस्से की तस्वीरें, स्थल निरीक्षण, मरम्मत संबंधी अभिलेख और विभागीय रिपोर्ट महत्वपूर्ण होंगे। यदि सड़क का हिस्सा वास्तव में बहा है, तो उसके कारणों और जिम्मेदारी की जांच होनी चाहिए।
लंबे समय से एक ही इकाई में पदस्थापना पर भी सवाल
प्राप्त जानकारी में उपअभियंता प्रीतम सिंह शार्वा की सितंबर 2019 से एक ही परियोजना इकाई में पदस्थापना का उल्लेख किया गया है। इस आधार पर उनकी पदस्थापना अवधि और परियोजनाओं की निगरानी में भूमिका को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। अधीक्षण अभियंता दीपक भुआर्य की भूमिका को लेकर भी स्पष्टीकरण की मांग की जा रही है।
हालांकि, लंबे समय तक एक ही इकाई में पदस्थापना अपने आप में भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं है। इस विषय में विभागीय पदस्थापना आदेशों, लागू स्थानांतरण नीति और संबंधित अधिकारियों की वास्तविक जिम्मेदारियों की पुष्टि की जानी चाहिए। किसी अधिकारी के विरुद्ध निष्कर्ष निकालने से पहले उपलब्ध दस्तावेजों और संबंधित पक्ष के जवाब का परीक्षण जरूरी है।
ग्रामीण विकास मंत्री और विभाग से जवाबदेही की मांग
इन सड़कों से संबंधित शिकायतों के मद्देनजर पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग तथा संबंधित अधिकारियों से कई सवालों के जवाब अपेक्षित हैं। क्या शुरुआती जांच में दर्ज कमियों का विधिवत निराकरण किया गया? क्या बाद की गुणवत्ता जांच की रिपोर्ट सार्वजनिक की जा सकती है? यदि सड़क का हिस्सा क्षतिग्रस्त हुआ, तो उसके तकनीकी कारण क्या रहे? अधूरे निर्माण को पूरा करने की जिम्मेदारी किसकी है और ग्रामीणों को पक्की सड़क कब तक उपलब्ध होगी?
पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री विजय शर्मा तथा संबंधित विभाग से अपेक्षा है कि शिकायतों और उपलब्ध दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच कराई जाए। जहां निर्माण संबंधी खामियां प्रमाणित हों, वहां नियमानुसार सुधार, जवाबदेही और आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
आदिवासी ग्रामीणों को बेहतर सड़क उपलब्ध कराना केवल विकास योजना का लक्ष्य नहीं, बल्कि बुनियादी सुविधाओं तक उनकी पहुंच से जुड़ा विषय है। इसलिए इस मामले में आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर दस्तावेजों पर आधारित जांच, पारदर्शिता और समयबद्ध कार्रवाई जरूरी है।
दंडकारण्य दर्पण का सवाल: कोयलीबेड़ा क्षेत्र की इन सड़कों की वास्तविक स्थिति क्या है? जांच रिपोर्ट में दर्ज कमियों पर क्या कार्रवाई हुई और अधूरे निर्माण को पूरा करने की समय-सीमा क्या है? संबंधित विभाग का आधिकारिक पक्ष सामने आने पर मामले की स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।
संपादकीय टिप्पणी: इस रिपोर्ट में शामिल आरोपों और निरीक्षण संबंधी विवरणों की स्वतंत्र पुष्टि तथा संबंधित विभाग, अधिकारियों और ठेकेदार का पक्ष प्राप्त किया जाना शेष है। जवाब मिलने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाना चाहिए।