नक्सल मामलों की वापसी तेज, UAPA प्रकरणों की समीक्षा पर उठे सवाल

आत्मसमर्पित पूर्व माओवादियों के पुनर्वास के साथ जेलों में बंद आरोपियों के मामलों की समीक्षा की मांग भी तेज, सरकार के पुराने आश्वासन के बीच उठे कई सवाल

नक्सल मामलों की वापसी तेज, UAPA प्रकरणों की समीक्षा पर उठे सवाल

 

आत्मसमर्पित पूर्व माओवादियों के पुनर्वास के साथ जेलों में बंद आरोपियों के मामलों की समीक्षा की मांग भी तेज, सरकार के पुराने आश्वासन के बीच उठे कई सवाल

 

रायपुर। छत्तीसगढ़ में नक्सल प्रकरणों की वापसी की प्रक्रिया को गति देने की कवायद के बीच जेलों में बंद आदिवासी आरोपियों के मामलों को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। सरकार ने गंभीर अपराध, जनहानि और यूएपीए से जुड़े मामलों को प्रकरण वापसी की प्रक्रिया से अलग रखते हुए पात्र मामलों की समीक्षा निर्धारित समयसीमा में पूरी करने के निर्देश दिए हैं। इसके बाद सवाल उठ रहा है कि लंबे समय से जेलों में बंद उन आरोपियों के मामलों की समीक्षा किस स्तर पर और किस समयसीमा में होगी, जिन पर नक्सल गतिविधियों से जुड़े आरोप हैं लेकिन उनके मामलों में अंतिम न्यायिक निर्णय अब तक नहीं हुआ है।

छत्तीसगढ़ में नक्सल प्रकरणों की समीक्षा और वापसी की प्रक्रिया के बीच UAPA मामलों को लेकर सवाल उठे हैं।

उप मुख्यमंत्री एवं गृह मंत्री विजय शर्मा ने 8 अक्टूबर को महानदी भवन में नक्सल प्रकरणों की समीक्षा को लेकर बैठक की। बैठक में अधिकारियों को जिला स्तरीय समितियों की बैठक 15 दिनों के भीतर तथा राज्य स्तरीय समिति की बैठक 5 नवंबर तक आयोजित करने के निर्देश दिए गए। सरकार की ओर से स्पष्ट किया गया है कि गंभीर अपराध, जनहानि और यूएपीए से जुड़े मामलों को छोड़कर पात्र प्रकरणों की वापसी की प्रक्रिया नियमानुसार और समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ाई जाएगी।

 

जेलों में बंद आरोपियों का सवाल फिर चर्चा में

 

नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शांति और पुनर्वास की नीति के बीच जेलों में बंद आरोपियों के मामलों की समीक्षा का मुद्दा नया नहीं है। पूर्व माओवादियों के आत्मसमर्पण और पुनर्वास कार्यक्रमों के दौरान भी यह विषय सरकार के सामने उठ चुका है।

 

मार्च 2026 में दंतेवाड़ा में आत्मसमर्पित माओवादियों से संवाद के दौरान जेलों में बंद ऐसे लोगों की जानकारी जुटाने की बात सामने आई थी, जो आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटने और पुनर्वास का लाभ लेने की इच्छा रखते हैं।

 

इसके बाद जुलाई 2026 में भी सरकार की ओर से ऐसे जेल निरुद्ध आरोपियों के मामलों की विधिसम्मत समीक्षा की बात कही गई थी, जिनके विरुद्ध गंभीर जनहानि से जुड़े मामले नहीं हैं। इसके लिए अभियोजन पक्ष और शासकीय अधिवक्ताओं के माध्यम से मामलों की नियमित समीक्षा तथा कानून के अनुरूप आवश्यक कार्रवाई की बात सामने आई थी।

 

UAPA मामलों को लेकर सबसे बड़ा सवाल

 

सरकार के ताजा फैसले में यूएपीए प्रकरणों को सामान्य प्रकरण वापसी की प्रक्रिया से बाहर रखने के बाद अब बहस का केंद्र यही मामले बन गए हैं।

 

कानूनी रूप से किसी व्यक्ति के खिलाफ यूएपीए या किसी अन्य गंभीर कानून के तहत मामला दर्ज होना अपने आप दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं है। किसी आरोपी की दोषसिद्धि या निर्दोषता का अंतिम निर्धारण न्यायालय द्वारा किया जाता है। इसलिए लंबे समय से जेल में निरुद्ध आरोपियों के मामलों में आरोपों की प्रकृति, उपलब्ध साक्ष्य, आरोप तय होने की स्थिति, सुनवाई की प्रगति और न्यायालय में लंबित मामलों की वर्तमान स्थिति महत्वपूर्ण हो जाती है।

 

यही वजह है कि नक्सल मामलों की समीक्षा की नीति के साथ यह सवाल भी सामने आ रहा है कि क्या प्रत्येक मामले को उसके अलग-अलग तथ्यों और न्यायिक स्थिति के आधार पर देखा जाएगा।

 

पुनर्वास के साथ न्यायिक प्रक्रिया पर भी नजर जरूरी

 

सरकार की ओर से आत्मसमर्पित पूर्व माओवादियों के पुनर्वास के लिए जमीन, आवास, रोजगार, कौशल प्रशिक्षण और जरूरी दस्तावेज उपलब्ध कराने जैसी योजनाओं पर जोर दिया जा रहा है। बड़ी संख्या में आत्मसमर्पित लोगों को पुनर्वास प्रक्रिया से जोड़ने की बात भी सरकार की ओर से कही गई है।

 

लेकिन इसके समानांतर जेलों में बंद आरोपियों और उनके परिवारों की अपनी अलग चिंता है। कई परिवार वर्षों से मुकदमों की सुनवाई और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में स्थायी शांति की नीति के साथ पुराने मामलों की न्यायिक प्रगति पर भी गंभीरता से ध्यान देने की मांग उठ रही है।

 

क्या हर मामले की अलग-अलग समीक्षा होगी?

 

माओवाद के खिलाफ अभियान और पुनर्वास नीति के साथ अब सरकार के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती यह भी है कि पुराने नक्सल मामलों में कानून के दायरे में रहते हुए किस तरह न्यायिक प्रक्रिया को गति दी जाए।

 

सिर्फ प्रकरण वापसी ही इसका एकमात्र रास्ता नहीं है। जहां मामले वापसी के कानूनी दायरे में नहीं आते, वहां भी लंबित मुकदमों की स्थिति, आरोपियों की न्यायिक स्थिति, सुनवाई की गति और उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा न्याय व्यवस्था के स्तर पर महत्वपूर्ण हो सकती है।

 

बस्तर और अन्य नक्सल प्रभावित इलाकों में शांति की प्रक्रिया आगे बढ़ने के साथ अब यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठ रहा है कि पुनर्वास की नीति का दायरा जेलों में बंद आरोपियों और उनके परिवारों तक किस रूप में पहुंचेगा।

 

सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती

 

एक तरफ आत्मसमर्पित लोगों को समाज की मुख्यधारा में वापस लाना और उन्हें सम्मानजनक जीवन उपलब्ध कराना सरकार की बड़ी प्राथमिकता है। दूसरी तरफ नक्सल प्रकरणों में वर्षों से जेल में बंद आरोपियों के मामलों में कानून सम्मत न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावी और समयबद्ध बनाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

 

ऐसे में आने वाले दिनों में जिला और राज्य स्तरीय समितियों की समीक्षा से यह स्पष्ट हो सकेगा कि किन मामलों में प्रकरण वापसी संभव है और किन मामलों को कानून के तहत आगे बढ़ाया जाएगा।

 

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि माओवाद के खिलाफ लंबी लड़ाई के बाद जब सरकार शांति, पुनर्वास और मुख्यधारा में वापसी की नीति को आगे बढ़ा रही है, तब पुराने नक्सल मामलों में जेलों में बंद लोगों की न्यायिक प्रक्रिया को भी क्या उसी गंभीरता और समयबद्धता के साथ आगे बढ़ाया जाएगा।

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