
भरंडा-हुच्चाकोट मार्ग सात दिन में बहाल, लेकिन बार-बार टूट रही पुलिया पर बड़ा सवाल
बाढ़ के बाद सात दिनों में एप्रोच रोड की मरम्मत से ग्रामीणों को राहत, लेकिन स्थायी समाधान कब होगा? खनिज क्षेत्र से जुड़े मार्ग पर जिम्मेदारी और निर्माण गुणवत्ता को लेकर उठ रहे सवाल
नारायणपुर, 06 अक्टूबर 2026। लगातार बारिश और तेज जल बहाव के कारण क्षतिग्रस्त हुआ भरंडा-हुच्चाकोट मार्ग सात दिनों के भीतर फिर से आवागमन के लिए बहाल कर दिया गया है। लोक निर्माण विभाग ने क्षतिग्रस्त एप्रोच रोड की मरम्मत पूरी कर ग्रामीणों को तत्काल राहत दी है। हालांकि, इस मार्ग की पुलिया और एप्रोच रोड के बार-बार क्षतिग्रस्त होने की समस्या अब भी एक बड़ा सवाल बनी हुई है।
बस्तर संभाग में लगातार तीन दिनों तक हुई बारिश के दौरान कई इलाकों में बाढ़ जैसे हालात बने थे। इसी दौरान भरंडा-हुच्चाकोट मार्ग पर स्थित करीब 72 मीटर लंबी पुलिया के एप्रोच रोड को तेज जल प्रवाह से नुकसान पहुंचा। मार्ग बाधित होने के कारण आसपास के ग्रामीणों को रोजमर्रा के आवागमन में परेशानी उठानी पड़ी।
सात दिन में मरम्मत, लेकिन स्थायी समाधान पर सवाल
लोक निर्माण विभाग ने ग्रामीणों की परेशानी को देखते हुए क्षतिग्रस्त हिस्से की मरम्मत तत्काल शुरू कराई। कार्यपालन अभियंता अहमद नवाज दानिस के नेतृत्व में जेसीबी और अन्य संसाधनों की मदद से काम कराया गया और सात दिनों के भीतर मार्ग को आवागमन के लिए बहाल कर दिया गया।
मरम्मत के बाद ग्रामीणों को फिलहाल राहत मिल गई है। स्कूल जाने वाले बच्चों, मरीजों और एम्बुलेंस सहित आवश्यक सेवाओं की आवाजाही भी पहले की तरह शुरू हो गई है।
लेकिन ग्रामीणों के सामने अब दूसरा सवाल है कि अगर यही पुलिया और उसका एप्रोच रोड बार-बार क्षतिग्रस्त हो रहा है, तो हर बार मरम्मत के बजाय इसका स्थायी समाधान क्यों नहीं किया जा रहा है?
बार-बार टूटने की वजह क्या है?
किसी भी पुलिया के एप्रोच रोड का बार-बार क्षतिग्रस्त होना केवल बारिश का विषय मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं है। तेज जल प्रवाह, जल निकासी की व्यवस्था, मिट्टी का कटाव, एप्रोच की संरचना, निर्माण सामग्री की गुणवत्ता और सड़क पर वाहनों के दबाव जैसे कई पहलुओं की तकनीकी जांच जरूरी हो सकती है।
भरंडा-हुच्चाकोट मार्ग के मामले में भी यह स्पष्ट होना जरूरी है कि क्या मौजूदा संरचना क्षेत्र में आने वाले बाढ़ के जलस्तर और जल प्रवाह को ध्यान में रखकर तैयार की गई है? क्या एप्रोच रोड के कटाव को रोकने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय किए गए हैं? और यदि मार्ग पर भारी वाहनों की आवाजाही होती है, तो क्या उसके अनुरूप सड़क और पुलिया की क्षमता का आकलन किया गया है?
इन सवालों का जवाब तकनीकी जांच और विभागीय रिकॉर्ड से ही सामने आ सकता है।
खनिज क्षेत्र से जुड़े मार्ग पर बढ़ा महत्व
यह क्षेत्र खनिज गतिविधियों से भी जुड़ा हुआ है। ऐसे में सड़क और पुलिया की स्थिति केवल ग्रामीणों के व्यक्तिगत आवागमन का विषय नहीं रह जाती, बल्कि क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों और परिवहन व्यवस्था से भी इसका सीधा संबंध है।
यदि इस मार्ग पर सामान्य ग्रामीण यातायात के साथ भारी वाहनों की आवाजाही भी होती है, तो सड़क और पुलिया की क्षमता, रखरखाव तथा सुरक्षा मानकों की नियमित समीक्षा और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
ग्रामीणों की परेशानी यह है कि मार्ग क्षतिग्रस्त होने के बाद मरम्मत तो कर दी जाती है, लेकिन बार-बार पैदा होने वाली समस्या का स्थायी समाधान कब होगा, इसका स्पष्ट जवाब अभी सामने नहीं आया है।
लापरवाही किसकी? जांच से सामने आना चाहिए सच
इस मामले में किसी व्यक्ति या विभाग को सीधे लापरवाही का जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा, जब तक तकनीकी जांच या आधिकारिक रिपोर्ट में ऐसा स्पष्ट न हो। लेकिन बार-बार क्षति होने की स्थिति में निर्माण गुणवत्ता, डिजाइन, जल निकासी, रखरखाव और भारी वाहनों के दबाव की जांच की जिम्मेदारी संबंधित विभाग की जरूर बनती है।
जरूरत इस बात की है कि संबंधित विभाग पुलिया और एप्रोच रोड का तकनीकी निरीक्षण कर यह स्पष्ट करे कि बार-बार क्षति की वास्तविक वजह क्या है और भविष्य में ऐसी स्थिति रोकने के लिए कौन से स्थायी उपाय किए जाएंगे।
सात दिनों में मार्ग बहाल होना निश्चित तौर पर ग्रामीणों के लिए राहत की बात है, लेकिन इस क्षेत्र के लोगों को हर बारिश के बाद सड़क बंद होने और फिर मरम्मत का इंतजार न करना पड़े, इसके लिए स्थायी समाधान और जवाबदेही जरूरी है।
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