
मक्का का MSP 24 रुपये किलो, किसानों को 10 से 12 रुपये मिलने की शिकायत
परलकोट के किसानों ने सरकारी खरीदी केंद्र शुरू करने की मांग उठाई, नमी और गुणवत्ता के नाम पर कीमत घटाने का भी आरोप
पखांजूर। परलकोट क्षेत्र में मक्का उत्पादक किसान लंबे समय से अपनी उपज की सरकारी समर्थन मूल्य पर खरीदी शुरू किए जाने की मांग कर रहे हैं। किसानों का कहना है कि यदि धान की तरह मक्का की भी सरकारी खरीदी केंद्रों के माध्यम से व्यवस्था की जाए तो उन्हें स्थानीय व्यापारियों और बिचौलियों के भरोसे कम कीमत पर फसल बेचने की मजबूरी से राहत मिल सकती है।
किसानों के मुताबिक मक्का की खेती में बीज, खाद, कीटनाशक, मजदूरी और सिंचाई सहित काफी खर्च होता है। फसल तैयार होने के बाद तत्काल पैसों की जरूरत के कारण कई किसान अपनी उपज स्थानीय स्तर पर ही बेचने को मजबूर हो जाते हैं। किसानों का आरोप है कि नमी, दाने की गुणवत्ता और अन्य कारणों का हवाला देकर कई बार मक्का की कीमत काफी कम कर दी जाती है।
24 रुपये प्रति किलो है मक्का का MSP
केंद्र सरकार ने खरीफ विपणन सत्र 2025-26 के लिए मक्का का न्यूनतम समर्थन मूल्य 2400 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया था। यानी MSP के हिसाब से मक्का की कीमत 24 रुपये प्रति किलो बैठती है। किसानों का सवाल है कि जब सरकार ने समर्थन मूल्य तय किया है तो स्थानीय स्तर पर उन्हें इससे काफी कम कीमत में अपनी उपज बेचने की नौबत क्यों आती है।
किसानों का कहना है कि केवल समर्थन मूल्य घोषित करना पर्याप्त नहीं है। उस मूल्य का लाभ किसानों तक पहुंचाने के लिए स्थानीय स्तर पर खरीदी केंद्र, पारदर्शी तौल, गुणवत्ता और नमी की जांच तथा समय पर भुगतान की व्यवस्था जरूरी है।
नमी और गुणवत्ता जांच पर उठ रहे सवाल
मक्का की खरीदी में नमी और गुणवत्ता महत्वपूर्ण मानक हो सकते हैं, लेकिन किसानों का कहना है कि इन मानकों के आधार पर कीमत में कटौती की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए।
किसानों की मांग है कि यदि मक्का में नमी अधिक है तो उसकी वास्तविक मात्रा मशीन से जांचकर किसान को बताई जाए। जांच का रिकॉर्ड उपलब्ध कराया जाए और गुणवत्ता के आधार पर होने वाली किसी भी कटौती का स्पष्ट हिसाब दिया जाए। किसानों का कहना है कि केवल मौखिक रूप से मक्का में नमी अधिक या गुणवत्ता खराब बताकर कीमत कम करना उचित नहीं है।
भुगतान में देरी की शिकायत भी सामने आई
किसानों ने कुछ मामलों में उपज खरीदने के बाद समय पर भुगतान नहीं होने की शिकायत भी बताई है। ग्रामीण क्षेत्र में किसान के पास तत्काल वैकल्पिक बाजार या प्रभावी शिकायत व्यवस्था सीमित होने के कारण स्थानीय व्यापारियों पर निर्भरता बनी रहती है।
फसल बेचने से मिलने वाला पैसा किसानों के लिए अगली खेती की तैयारी, घरेलू जरूरतों और पुराने खर्चों की भरपाई का महत्वपूर्ण साधन होता है। ऐसे में समय पर भुगतान नहीं मिलने से किसानों की आर्थिक परेशानी बढ़ सकती है।
सरकारी खरीदी केंद्र की मांग
परलकोट क्षेत्र के किसानों की मुख्य मांग है कि मक्का उत्पादक क्षेत्रों में सरकारी खरीदी केंद्र स्थापित किए जाएं। किसानों का कहना है कि सरकारी खरीदी शुरू होने से उन्हें अपनी फसल बेचने के लिए एक वैकल्पिक और पारदर्शी व्यवस्था मिलेगी।
किसानों ने मक्का की नमी और गुणवत्ता जांच के लिए वैज्ञानिक व्यवस्था, पारदर्शी तौल तथा समयबद्ध भुगतान सुनिश्चित करने की मांग की है।
सवाल सरकार और जनप्रतिनिधियों से भी
परलकोट में मक्का की सरकारी खरीदी का मुद्दा नया नहीं है। किसानों का कहना है कि वर्षों से मक्का उत्पादन करने वाले क्षेत्र में स्थायी सरकारी खरीदी व्यवस्था नहीं बन पाने का सवाल सरकारों के साथ स्थानीय जनप्रतिनिधियों के सामने भी है।
वर्तमान में केंद्र और छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार है। कांकेर लोकसभा क्षेत्र के सांसद भोजराज नाग और अंतागढ़ विधानसभा क्षेत्र के विधायक विक्रम उसेंडी के सामने भी किसानों की इस मांग को सरकार तक पहुंचाने और स्थायी समाधान की पहल करने की अपेक्षा किसानों द्वारा जताई जा रही है।
किसानों के सामने सबसे बड़ा सवाल
परलकोट के किसानों का कहना है कि सरकार द्वारा समर्थन मूल्य घोषित किए जाने के बाद भी यदि किसान अपनी फसल कम कीमत पर बेचने को मजबूर है तो समर्थन मूल्य का वास्तविक लाभ किसान तक पहुंचाने की व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
किसानों की मांग है कि मक्का खरीदी की ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जिसमें किसान को अपनी उपज की सही कीमत मिले, नमी और गुणवत्ता की जांच पारदर्शी हो, तौल में किसी तरह की गड़बड़ी की गुंजाइश न रहे और भुगतान निर्धारित समय के भीतर हो।
परलकोट के मक्का किसानों का सवाल सीधा है कि सरकार द्वारा तय समर्थन मूल्य का लाभ आखिर खेत में मेहनत करने वाले किसान तक कैसे पहुंचेगा। अब किसानों की नजर सरकार और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की पहल पर है।