National : झीरम कांड के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट जाएगा सर्व आदिवासी समाज

सजा पाए 10 लोगों को निर्दोष बताने का परिजनों का दावा, व्यापक साजिश की दोबारा जांच की मांग, कानूनी लड़ाई के लिए हर आदिवासी परिवार से 20 रुपये सहयोग जुटाने की तैयारी

झीरम कांड के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट जाएगा सर्व आदिवासी समाज

 

सजा पाए 10 लोगों को निर्दोष बताने का परिजनों का दावा, व्यापक साजिश की दोबारा जांच की मांग, कानूनी लड़ाई के लिए हर आदिवासी परिवार से 20 रुपये सहयोग जुटाने की तैयारी

 

जगदलपुर। झीरम घाटी कांड में एनआईए की विशेष अदालत द्वारा 10 दोषियों को मृत्युदंड सुनाए जाने के बाद अब सर्व आदिवासी समाज ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देने का निर्णय लिया है। समाज का कहना है कि सजा पाए लोगों के परिजनों ने दावा किया है कि उनके परिवार के सदस्य झीरम हमले में शामिल नहीं थे और उन्हें गलत तरीके से मामले में फंसाया गया है। इन दावों की अंतिम पुष्टि अदालत की अपील प्रक्रिया में ही होगी।

25 मई 2013 को हुआ था झीरम हमला

 

बस्तर के दरभा क्षेत्र की झीरम घाटी में 25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के काफिले पर माओवादी हमला हुआ था। हमले में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल सहित कई नेताओं और सुरक्षाकर्मियों की मौत हुई थी। इस मामले की जांच बाद में राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने की।

 

13 साल बाद आया अदालत का फैसला

 

झीरम मामले में जगदलपुर की विशेष एनआईए अदालत ने 5 सितंबर 2026 को 10 आरोपियों को दोषी ठहराया था। इसके बाद 16 सितंबर को अदालत ने सभी 10 दोषियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई। मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से 101 गवाहों के बयान कराए गए। अदालत के फैसले के खिलाफ दोषियों को हाईकोर्ट जाने का अधिकार है और इसके लिए 30 दिन का समय दिया गया है।

 

सर्व आदिवासी समाज को क्यों है आपत्ति

 

19 सितंबर को जगदलपुर के परपा स्थित कोया समाज भवन में बस्तर संभाग के विभिन्न जिलों के प्रतिनिधियों और सजा पाए आरोपियों के परिजनों की बैठक हुई। बैठक में समाज ने अदालत के फैसले की कानूनी समीक्षा कर हाईकोर्ट में अपील की तैयारी करने का निर्णय लिया।

 

समाज के पदाधिकारियों के अनुसार, प्रभावित परिवारों का कहना है कि जिन 10 लोगों को दोषी ठहराया गया है, वे झीरम हमले में शामिल नहीं थे। समाज ने यह भी सवाल उठाया है कि हमले के पीछे की व्यापक साजिश और अन्य संदिग्धों की भूमिका की पूरी तरह जांच हुई या नहीं। यह समाज की मांग और आरोप हैं, जिन्हें अदालत के अंतिम निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जा सकता।

 

मुख्य साजिश और अन्य आरोपियों की भूमिका की जांच की मांग

 

सर्व आदिवासी समाज ने झीरम कांड की व्यापक साजिश की दोबारा जांच की मांग की है। समाज का कहना है कि मामले में केवल उन लोगों तक जांच सीमित नहीं रहनी चाहिए जिन्हें वर्तमान मुकदमे में दोषी ठहराया गया है, बल्कि कथित मुख्य साजिशकर्ताओं और अन्य संदिग्धों की भूमिका भी सामने आनी चाहिए।

 

एनआईए के मामले में कई अन्य लोगों के नाम भी आरोपपत्रों में आए थे और कुछ आरोपी फरार बताए गए हैं। इसलिए मौजूदा 10 दोषियों की सजा के साथ मामले से जुड़े अन्य पहलुओं की कानूनी स्थिति पर भी आगे की प्रक्रिया महत्वपूर्ण रहेगी।

 

हर परिवार से 20 रुपये जुटाने की तैयारी

 

कानूनी लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए सर्व आदिवासी समाज ने आर्थिक सहयोग जुटाने का निर्णय लिया है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार समाज के पारंपरिक मुखियाओं और प्रतिनिधियों के माध्यम से गांव गांव जाकर प्रत्येक आदिवासी परिवार से 20 रुपये का स्वैच्छिक सहयोग जुटाने की तैयारी है। इस राशि का उपयोग हाईकोर्ट में कानूनी पैरवी और संबंधित खर्चों के लिए किए जाने की बात कही गई है। जरूरत पड़ने पर मामला सुप्रीम कोर्ट तक ले जाने की भी बात समाज की ओर से कही गई है।

 

अब आगे क्या होगा

 

झीरम मामले में एनआईए अदालत का फैसला आने के बाद अब अगला महत्वपूर्ण चरण हाईकोर्ट की न्यायिक प्रक्रिया है। मृत्युदंड के मामलों में ट्रायल कोर्ट का फैसला अंतिम नहीं होता और उच्च न्यायालय में इसकी न्यायिक समीक्षा होती है। सर्व आदिवासी समाज ने कानूनी दस्तावेजों की समीक्षा कर अपील की तैयारी शुरू करने की बात कही है।

 

इस पूरे घटनाक्रम में एक तरफ झीरम हमले के पीड़ित परिवारों और लंबे समय से न्याय की मांग कर रहे पक्षों की अपनी अपेक्षाएं हैं, वहीं दूसरी तरफ सजा पाए लोगों के परिजनों और सर्व आदिवासी समाज का दावा है कि दोषी ठहराए गए लोग निर्दोष हैं। इन दावों और आपत्तियों पर अंतिम निर्णय उच्च न्यायालय और आगे की न्यायिक प्रक्रिया में होना है।

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