CG News: अबूझमाड़ के 45 आदिवासी बच्चों के भविष्य पर संकट, 11वीं के बाद आश्रम छोड़ने को मजबूर

रामकृष्ण मिशन आश्रम में सीटों की कमी बताकर 45 विद्यार्थियों को आगे रखने में असमर्थता, इनमें 11 बालिकाएं भी शामिल। वर्षों से आश्रम में रहकर पढ़ने वाले बच्चों के सामने अब आगे की पढ़ाई और भविष्य को लेकर गहरा संकट।

 

अबूझमाड़ के 45 आदिवासी बच्चों के भविष्य पर संकट, 11वीं के बाद आश्रम छोड़ने को मजबूर

 

रामकृष्ण मिशन आश्रम में सीटों की कमी बताकर 45 विद्यार्थियों को आगे रखने में असमर्थता, इनमें 11 बालिकाएं भी शामिल। वर्षों से आश्रम में रहकर पढ़ने वाले बच्चों के सामने अब आगे की पढ़ाई और भविष्य को लेकर गहरा संकट।

नारायणपुर। अबूझमाड़ के दूरस्थ और दुर्गम गांवों से बचपन में लाकर शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने वाले रामकृष्ण मिशन आश्रम से इस वर्ष 11वीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद 45 आदिवासी विद्यार्थियों को आगे आश्रम में नहीं रखे जाने की जानकारी सामने आई है। बताया जा रहा है कि आश्रम में पर्याप्त सीट उपलब्ध नहीं होने के कारण इन विद्यार्थियों को आगे की व्यवस्था स्वयं करने के लिए कहा गया है। इन 45 विद्यार्थियों में 11 बालिकाएं भी शामिल हैं।

 

यह खबर केवल 45 विद्यार्थियों की नहीं, बल्कि उन 45 सपनों की है जो वर्षों से आश्रम की छत के नीचे पलते और आगे बढ़ते रहे। बचपन से आश्रम छात्रावास में रहकर पढ़ाई करने वाले इन बच्चों के लिए अब अचानक नई व्यवस्था तलाशना आसान नहीं है। उनके अधिकांश गांव आज भी शिक्षा, सड़क, परिवहन और अन्य बुनियादी सुविधाओं से पूरी तरह नहीं जुड़े हैं।

सबसे बड़ी चिंता यह है कि इन बच्चों की आगे की पढ़ाई अब कैसे पूरी होगी। जिन विद्यार्थियों ने अपना पूरा बचपन छात्रावास के अनुशासित वातावरण में बिताया, उनके लिए गांव लौटकर नियमित शिक्षा जारी रखना बेहद कठिन होगा। कई बच्चों के सामने स्कूल छोड़ने की नौबत आ सकती है, जबकि कई बालिकाओं की शिक्षा बीच में ही रुक जाने की आशंका भी जताई जा रही है।

अबूझमाड़ लंबे समय तक नक्सल हिंसा से प्रभावित क्षेत्र रहा है। हाल के वर्षों में यहां शांति और विकास की नई उम्मीद जगी है, लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में चुनौतियां अब भी गंभीर हैं। अनेक गांवों में आज भी गुणवत्तापूर्ण स्कूल, छात्रावास, सड़क, परिवहन और उच्च शिक्षा की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। ऐसे में इन बच्चों के सामने खड़ा यह संकट पूरे क्षेत्र के लिए चिंता का विषय बन गया है।

स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि इन विद्यार्थियों के लिए शीघ्र वैकल्पिक छात्रावास और शिक्षा की व्यवस्था नहीं की गई, तो वर्षों की मेहनत और संघर्ष पर पानी फिर सकता है। जिन बच्चों के हाथों में किताबें होनी चाहिए, वे मजबूरी में अपने गांवों तक सीमित होकर रह जाएंगे। यह स्थिति न केवल उनके सपनों को प्रभावित करेगी, बल्कि अबूझमाड़ में शिक्षा के माध्यम से बदलाव की उम्मीदों को भी कमजोर कर सकती है।

आज जरूरत इस बात की है कि शासन, प्रशासन और सामाजिक संस्थाएं मिलकर इन 45 विद्यार्थियों के भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में तत्काल ठोस पहल करें, ताकि आर्थिक, सामाजिक और भौगोलिक कठिनाइयों के बीच भी उनके सपनों की रोशनी बुझने न पाए।

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