
नक्सल मुक्त अबूझमाड़ अब पर्यावरण संकट की चपेट में
जंगलों की अंधाधुंध कटाई से बदल रहा अबूझमाड़ का स्वरूप, जल-जंगल-जमीन पर मंडराया बड़ा खतरा
बस्तर कभी घने जंगलों, दुर्लभ जैव विविधता और प्राकृतिक संतुलन के लिए पहचाना जाने वाला अबूझमाड़ अब एक नए संकट का सामना कर रहा है। वर्षों तक नक्सल प्रभाव और बाहरी हस्तक्षेप से दूर रहे इस क्षेत्र में अब तेजी से जंगलों की कटाई, आगजनी और मानव हस्तक्षेप बढ़ने लगा है। स्थानीय लोगों और पर्यावरण से जुड़े जानकारों का कहना है कि अबूझमाड़ भले ही नक्सल प्रभाव से धीरे-धीरे मुक्त हो रहा हो, लेकिन अब यहां के जल, जंगल और जमीन पर बड़ा खतरा मंडराने लगा है।
देखा जा रहा है की अबूझमाड़ के कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई की जा रही है। जंगल साफ कर जमीन को जलाया जा रहा है, जिससे प्राकृतिक वन क्षेत्र लगातार सिमटता जा रहा है। इस अंधाधुंध कटाई का असर अब सीधे यहां के इकोसिस्टम पर दिखाई देने लगा है। वन्य जीवों का प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहा है और कई दुर्लभ जीव-जंतु लगातार संकट में आते जा रहे हैं। जंगलों में आग लगने और पेड़ों की कटाई के कारण पक्षियों, छोटे वन्य जीवों और जैव विविधता को भारी नुकसान पहुंच रहा है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि अबूझमाड़ जैसे संवेदनशील क्षेत्र में जंगलों का विनाश केवल स्थानीय समस्या नहीं है, बल्कि इसका असर पूरे बस्तर क्षेत्र के मौसम और पर्यावरण संतुलन पर पड़ सकता है। बीते कुछ वर्षों में क्षेत्र के तापमान में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। जहां कभी घने जंगलों और ठंडी हवाओं के लिए अबूझमाड़ जाना जाता था, वहीं अब गर्मी का असर पहले की तुलना में अधिक महसूस होने लगा है।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि जंगल कम होने से जलस्रोत भी प्रभावित हो रहे हैं। कई छोटी नदियों और प्राकृतिक जलधाराओं का जलस्तर घटने लगा है। यदि यही स्थिति आगे भी जारी रही तो आने वाले वर्षों में पानी की गंभीर समस्या पैदा हो सकती है। जंगलों के खत्म होने से मिट्टी का कटाव बढ़ेगा, खेती प्रभावित होगी और वन आधारित जीवन जीने वाले आदिवासी समुदायों के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो सकता है।
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि अबूझमाड़ में अनियंत्रित कटाई और पर्यावरण से छेड़छाड़ नहीं रोकी गई तो आने वाले समय में यह क्षेत्र भीषण गर्मी, जल संकट और जैव विविधता के विनाश का केंद्र बन सकता है। इससे न केवल वन्य जीवन प्रभावित होगा, बल्कि आदिवासी संस्कृति और पारंपरिक जीवनशैली भी गहरे संकट में पड़ जाएगी।
अबूझमाड़ केवल एक जंगल नहीं, बल्कि बस्तर की प्राकृतिक आत्मा माना जाता है। ऐसे में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती बन गई है। पर्यावरण संरक्षण को लेकर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियों को इसका गंभीर परिणाम भुगतना पड़ सकता है।