
दंडकारण्य दर्पण
अबूझमाड़ में धधकते जंगल, विकास की आड़ में विनाश का खतरा
प्रधान- संपादक
नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ क्षेत्र से जंगलों में आग लगाए जाने की चिंताजनक तस्वीरें सामने आई हैं। हाल के समय में नक्सल प्रभाव कम होने के बाद कुछ इलाकों में जंगलों को जलाकर साफ किए जाने की घटनाएं बढ़ती दिख रही हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि जमीन को उपयोग में लाने के उद्देश्य से इस तरह की गतिविधियां की जा रही हैं।
अबूझमाड़ जैसे संवेदनशील वन क्षेत्र में इस तरह जंगलों का नष्ट होना कई गंभीर सवाल खड़े करता है। यह इलाका अपनी समृद्ध जैव विविधता और आदिवासी जीवनशैली के लिए जाना जाता है, जहां प्रकृति और मानव का गहरा संबंध रहा है।
जंगलों में आग लगाने से सबसे बड़ा नुकसान पर्यावरण को हो रहा है। पेड़ों के साथ-साथ वन्य जीवों का प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहा है। कई छोटे जीव-जंतु और पक्षी इस आग की चपेट में आकर खत्म हो जाते हैं, जिससे पारिस्थितिकी संतुलन बिगड़ने लगता है।
स्थानीय स्तर पर इसका असर साफ दिखाई देने लगा है। तापमान में बढ़ोतरी, जमीन का सूखना और हवा में गर्मी का बढ़ना लोगों को महसूस हो रहा है। जंगल कम होने से वर्षा पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है, जिससे आने वाले समय में जल संकट गहरा सकता है।
इसका सीधा असर यहां के आदिवासी समुदायों पर पड़ रहा है, जिनकी आजीविका जंगलों पर ही आधारित है। वन उत्पाद, ईंधन और भोजन के स्रोत खत्म होने से उनका जीवन और कठिन हो सकता है।
अनुभवी लोगों का मानना है कि जंगल जलाने से मिट्टी की उर्वरता भी खत्म होती है, जिससे जमीन लंबे समय तक अनुपयोगी हो सकती है। ऐसे में जिस विकास की उम्मीद की जा रही है, वह उल्टा नुकसान का कारण बन सकता है।
प्रशासन के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती इन घटनाओं पर रोक लगाने और वन संरक्षण सुनिश्चित करने की है। दूरस्थ क्षेत्र होने के कारण निगरानी कठिन जरूर है, लेकिन समय रहते कदम उठाना जरूरी है।
दंडकारण्य क्षेत्र में प्रकृति ही जीवन का आधार है। ऐसे में यदि जंगलों को नुकसान पहुंचता है, तो इसका असर केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सामाजिक और आर्थिक ढांचे पर भी गहरा प्रभाव पड़ेगा।
जंगल बचेंगे, तभी जीवन बचेगा — यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश है।