
गरियाबंद के चिंगरा पगार की चट्टनों पर की जा रही अवैध नक्काशी – कला का प्रदर्शन है या संरक्षित वन क्षेत्र में अवैध छेड़छाड़ और मानी ?
गरियाबंद। छत्तीसगढ़ का चिंगरा पगार के प्राकृतिक परिदृश्य पर उकेरी गई जीवंत चट्टानी मूर्तियों ने हाल-फिलहाल में पर्यटकों और सोशल मीडिया का ध्यान आकर्षित किया है। खैरागढ़ के कलाकार दंपति धरम नेताम और मनीषा नेताम द्वारा बनायी गई सैकड़ों जानवरों-आकृतियों (अजगर, शेर, तेंदुआ, मगरमच्छ, गिरगिट, कछुआ, केकड़ा, जंगली भैंसा आदि) की नक्काशियाँ मशहूर होने लगीं। कलाकारों का कहना है कि वे पिछले दो महीनों से चिंगरा पगार पर काम कर रहे थे और खैरागढ़ के गंड़ई गाँव से ताल्लुक रखते हैं। दोनों ने खैरागढ़ में पत्थर नक्काशी का प्रशिक्षण लिया है और अहमदाबाद में भी अपनी कला प्रदर्शित कर चुके हैं।
वन विभाग की ओर से जारी रिपोर्ट और स्थानीय प्रचार में कहा गया कि यह पहल पर्यटन बढ़ाने और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक व प्राकृतिक विरासत को उजागर करने के लिए की गयी है। विभाग के अधिकारियों ने इस कोशिश को सकारात्मक बताते हुए कहा था कि इससे स्थानीय पर्यटन और पर्यावरण-जागरूकता को बढ़ावा मिलेगा।
लेकिन अब इस परियोजना के कानूनी और नैतिक आयामों को लेकर गंभीर आरोप उठे हैं। स्थानीय पर्यावरण कार्यकर्ताओं, नागरिकों और कुछ समाचार स्रोतों का कहना है कि यह काम संरक्षित वन क्षेत्र के भीतर हुआ है — ऐसे क्षेत्र में प्राकृतिक संरचना से छेड़छाड़ करना भारतीय वन कानूनों के अंतर्गत अपराध माना जा सकता है। उनके अनुसार, संरक्षित क्षेत्र में पत्थरों पर नक्काशी, प्राकृतिक आवास में परिवर्तन और बिना कानूनी अनुमति के की गयी किसी भी गतिविधि पर कड़ी नियम लागू होंगे ।
कानूनी विशेषज्ञों और पर्यावरण नियम-कानूनों के सामान्य प्रावधानों के मुताबिक संरक्षित वनों और वन्यजीव आवासों में प्राकृतिक संसाधन या भू-संरचना को क्षति पहुँचाना वन कानूनों के अंतर्गत दंडनीय हो सकता है।
वन्यजीव संरक्षण से जुड़े कानून और पर्यावरण संरक्षण के प्रावधान भी ऐसी मनमानी कला प्रदर्शन पर लागू हो सकते हैं।
स्थानीय एक्टिविस्ट और कुछ सोशल-मीडिया यूज़र्स ने आरोप लगाया है कि जनता के करों से प्रायोजित विभागीय संसाधनों का उपयोग संरक्षित क्षेत्र में ऐसी छेड़छाड़ के लिए करना चिंताजनक और अनावश्यक है और इस पर तत्काल पारदर्शी जांच होनी चाहिए। उनका कहना है कि कला और पर्यटन के नाम पर प्राकृतिक आवासों की स्थिरता, जैव-विविधता और कानूनों की अनदेखी जैसी गंभीर समस्याएँ पैदा हो सकती हैं।
दूसरी ओर, कलाकार धरम–मनीषा का कहना है कि उनका उद्देश्य प्रकृति और कला का मेल कर लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करना था और उन्होंने वन विभाग के सहयोग का उल्लेख किया है। विभाग ने पहले इस पहल के सकारात्मक प्रभावों का हवाला दिया था।
क्या चिंगरा पगार वाकई किसी संरक्षित वन क्षेत्र के अंतर्गत आता है?
अगर आता है, तो क्या किसी प्रकार की लिखित अनुमति, पर्यावरणीय स्वीकृति या कोर-जोन/बफर-जोन्स की छूट दी गयी थी?
इस काम के लिये खर्च हुए सार्वजनिक संसाधनों का लेखा-जोखा क्या है और कौन-सी विभागीय प्रक्रिया अपनायी गयी?
स्थानीय जैव-विविधता और आवासीय प्रभावों का पूर्व मूल्यांकन (EIA या समकक्ष) कराया गया था या नहीं?
इस मामले ने स्पष्ट रूप से कला-पर्यटन और वन-संरक्षण के बीच तनाव को सामने रखा है। यदि क्षेत्र संरक्षित है और अनुमति/अनुमोदन के बिना इस तरह का काम किया गया है, तो यह कानून के तहत जांच का विषय बनता है। नागरिकों, स्थानीय समुदायों और पर्यावरण समूहों के लिए आवश्यक है कि वे संबंधित दस्तावेज, अनुमति और विभागीय संचार की मांग करें। मीडिया और स्थानीय प्रशासन से भी पारदर्शिता तथा त्वरित, निष्पक्ष जांच की अपेक्षा की जानी चाहिए।