CG: आदिवासी के अपने रीति रिवाज, परंपरा एव अमूल्य सांस्कृतिक विरासत विलुप्ती से समाज चिंतित …

 

बस्तर संभाग में परिस्थितियां लगातार विषम होती जा रही है इस परिस्थिति में आदिवासी क अपने रीति रिवाज, परंपरा एव अमूल्य सांस्कृतिक विरासत विलुप्ती के मुहा पर खड़ा नजर आ रही है। अतः आदिवासी अपने अस्तित्व की लड़ाई के लि संघर्ष कर रहे है। आदिवासी समाज की कुछ चिंताएं उभर कर सामने आ रह हैं जिन पर अपनी बात रखना आवश्यक है।

 

1. बस्तर अंचल के विभिन्न मुद्दों को प्रमुखता के साथ उठाने वाले समाजा प्रमुख व संगठनों को दबाव डाल कर कुचलने का प्रयास किया जा रह है। जब कोई आदिवासियों के हक अधिकार की बात करता है या उनक अधिकारों की जानकारी देता है तो वह मानो कोई गुनाह कर देता है। जैस हाल ही में तेंदूपत्ता बोनस घोटाले के संबंध में आवाज उठाने वाले पूत विधायक मनीष कुंजाम के घर में छापा मारा गया यह कार्यवाही एक संवैधानिक तरीके से आवाज उठाने वाले को दबाने के लिए की गन कार्यवाही है जिसे आप सभी भलीभांति से जानते है। जो शिकायतकर्ता उसी के ऊपर कार्यवाही करना ये कहाँ का न्याय है ?

 

2. सम्पूर्ण बस्तर संभाग वर्षों से शिक्षा से वचित रहा है, आदिवासियो की प्रथ पीढ़ी या दूसरी पीढ़ी ही अभी शिक्षा प्राप्त कर रही है। इस परिस्थिति वर्तमान में युक्तियुक्तकरण की प्रक्रिया मानो आदिवासियों को शिक्षित हो से रोक रहा है। क्योंकि जब तक आदिवासी अपने हक और अधिकारों व

 

नहीं समझेगा तब तक वो सही गलत का फर्क नहीं समझ सकता है इसके लिए आवश्यक है कि शालाओं में शिक्षकों की पदस्थापना कक्षाव एवं विषयवार हो ताकि बस्तर संभाग के आदिवासी हर विषय में दक्ष हासिल कर सके । परंतु वर्तमान में जो युक्तियुक्तकरण किया जा रहा वो नाम मात्र की स्कूलों को संचालित करने ही शिक्षकों की नियुक्ति रही है।

शिक्षा की गुणवत्ता पर बात करना बेईमानी है। इससे आदिवासियों का शिक्षा के क्षेत्रों में कोई भलाई नहीं होने वाला है। बस्तर जैसे अति पिछड़ा अशिक्षित और पांचवी अनुसूचित क्षेत्रों में तो प्राथमिक स्कूल के कक्षाओं में हर कक्षा के अनुसार शिक्षकों की पदस्थापना करना चाहिए ताकि आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा का अलख जगे सकें। बस्तर संभाग के सभी जिलों को युक्तियुक्तकरण की प्रक्रिया से पूरी तरह अलग रखना चाहिए था। युक्तियुक्तकरण छ०ग० शिक्षा विभाग में हो रहे युक्तियुक्त करण में मिडिया के माध्यम से लगातार अनियमितताओं का उजागर किया जा रहा है इस प्रक्रिया में न तो विषय का ध्यान रखा गया है न ही परिविक्षा अवधि और वरिष्ठता का। नारायणपुर में भी ऐसे ही भारी अनियमितता पाया गया है। अपने चहेत लोगों के लिए रिक्त स्थानों को गुप्त रखा जा है उदारण के लिए बा० उ०मा०वि०नारायणपुर का है जहां रिक्त होते हुए भी प्रथत कांउंसिलिंग में नहीं दिखाया गया

 

जबकि 20/06/2025 को संभाग से उक्त स्कूल में पद भार हेतु आदेशित किया गया है। इसके साथ ही विकलांग एंव महिलाओं के साथ भी समीप में स्थित रिक्त विधालयों को गुप्त रखकर दुर्गम स्थानों में पदस्थापना कर अन्याय किया गया।

 

नारायणपुर के ओरछा विकासखण्ड में भारी अनियमितता उजागर हो चुका है गोमे पंचायत के बीनागुण्डा में एक बड़े गांव जहाँ 20 से 25 बस्ती है और 30-35 बच्चे दाखिल योग्य हैं उस विद्यालय को शून्य दर्ज बताकर स्कूल बंद कर दिया गया। जिसकी सूचना उक्त ग्राम वासियों के द्वारा वर्तमान कलेक्टर महोदया की दी परन्तु कोई कार्यवाही नहीं की गई। इस प्रकार अति विशेष पिछड़ी जनजाति के साथ शिक्षा जैरो संवैधानिक अधिकार से वंचित करने काम किया जा रहा है।

 

3. बस्तर की विकट परिस्थितियों को जब समाज चिन्तन करता है तो सामान्य प्रतीत नहीं होता है कहीं न कहीं बस्तर के ज्वलंत मुद्दों पर बात करने वाले या काम करने वालों को दबाया जा रहा है। उन्हें शासन प्रशासन से अपनी बात रखने के लिए रोका जा रहा है सामाजिक कार्यकताओं को दबाने की कोशिश की जाती है।

 

4. आदिवासियों को प्राप्त संवैधानिक अधिकारों का खुलम खुला उल्लघंन शासन प्रशासन द्वारा किया जा रहा है। जैसे पेसा कानून और वन अधिकार कानून । वन अधिकार कानून के तहत बस्तर संभाग के आदिवासियों को अपने जीविकार्जन के लिए पर्यावास पत्रक धारण करने का पूर्ण अधिकार है। परंतु आदिवासी जब इस अधिकार का बात करता है तो उसे दूसरे मुद्दों पर उलझा के उस अधिकार से वंचित किया जाता है। जिसका जीता जागता उदाहरण अबुझमाड़ का है जहां के अबुझमाड़िया लोग निरतंर पर्यावास पट्टा की मांग कर रहे है परंतु प्रशासन उन्हे मसाति पट्टा देकर उनके मांग को दरकिनार कर रही है। इसी प्रकार पेसा कानून में ग्राम सभा को सर्वोपरि माना गया है परंतु जब किसी ग्राम की विकास की बात होती है या योजना बनाने की बात होती है तो ग्राम सभा को एक रबर स्टम्प की तरह उपयोग किया जाता है न कि एक सर्वोपरि एक संस्था के रूप में। 18 अप्रैल 2013 वेदांता जजमेंट सुप्रीम कोर्ट “लोक सभा न विधान सभा सबसे ऊँची ग्राम सभा” इसका मतलब साफ है कि ग्राम की विकास व योजनाओं की रूप रेखा ग्रामों में बनना चाहिए ना कि जनपद या जिला से बनके ग्रामों में जाना चाहिए।

 

– बस्तर संभाग खनिज संपदा के मामले में आत्मनिर्भर संभाग है। जहां विभिन्न प्रकार के खनिज संपदा इसके गर्भ में स्थित है इन खनिजों का दोहन आदिवासियों के उत्थान और स्थानीय रोजगार के शर्तों पर होना चाहिए इसके विपरीत नगरनार जैसे इस्पात संयंत्र को निजी हाथों में

 

के लिए तैयार है। जिससे ना आदिवासियों का उद्धार होगा न किसी स्थानीय यवकों को उक्त कम्पनी में नौकरी लग पायेगी क्योंकि आदिवासी अभी शिक्षा के मामले में प्रथम सीढी ही पार कर पाया है। बस्तर संभाग के सभी जिलों में स्थित खनिज संपदा को तेजी से निजी कम्पनियों सौंपा जा रहा है। बैलाडीला की पहाडियों के खदानों एवं अन्य जिलों में स्थित खदानों को निजी हाथों में सौंपकर जो खनिज 70 साल में निकाला जाना था वह खनिज 10 साल में ही निकाला जा रहा है। इतनी हडबडी या जल्दीबाजी क्यों ? क्या स्थानीय लोंगों को इन कम्पनियों में नौकरी लगेगी? ये एक यक्ष प्रश्न है। प्लेसमेंट एजेंसी बनाकर स्थानीय युवको के साथ घोर मजाक किया जाता है।

 

6. आश्रम शाला / छात्रावास में लगातार आदिवासी लडकियों के साथ बलात्कार और लैंगिक उत्पीडन की घटनाएं हो रही है। पांचवी अनुसूची क्षेत्रों में आदिवासियों की अस्मिता के साथ खिलवाड किया जाता है। पांचवी अनुसूची क्षेत्रों में स्थित आश्रम छात्रावासों में आदिवासियों की रीति रिवाज, परंपरा और सांस्कृतिक रूप प्रतिष्ठित लोगों को ही अधीक्षक या अधीक्षिका बनाया जाए ताकि आश्रम छात्रावासों में निवासरत छात्र छात्राएं अपने रीति रिवाज को छात्र जीवन से ही समझ सके सर्व आदिवासी समाज बस्तर संभाग इसकी मांग करता है।

 

7. बस्तर संभाग पांचवी अनुसूची क्षेत्र में आता है जहां पर एक विशेष संवैधानिक प्रावधान है। उस विशेष संवैधानिक प्रावधान का पालन किये बिना ही जंगल जमींन आदि की अधिग्रहण की विकास के नाम से संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन कर अधिग्रहण कर लिया जाता है। विकास के नाम से बस्तर संभाग में जंगल क्षेत्र में तेजी से कमी आई है। आदिवासियों के बिना सहमति के विस्थापन किया जाता है। चाहे वो पोलावरम बांध हो चाहे वो बोधघाट पनबिजली परियोजना हों।

 

8. बस्तर संभाग के सभी जिलों में भू माफिया सक्रिय है। राजस्व विभाग के कुछ कर्मचारियों की मिलीभगत से भू माफिया आदिवासियों एवं गैर आदिवासियों की जमींन को हड़प रहे है। इसके प्रमाण जगदलपुर शहर में भी आपके मीडिया के माध्यम से उजागर हुए हैं ऐसे मामलों में कोई भी कार्यवाही नहीं हो रही है तथा बकावंड बस्तर ब्लॉक में आदिवासी जमीनों को लीज पर लेकर अवैध कब्जा किया जा रहा है। भू माफियाओं पर नियंत्रण के लिए छत्तीसगढ़ राज्य में विधानसभा के द्वारा भू माफीया नियंत्रण अधिनियम पारित करना जरूरी है क्योंकि भू राजस्व संहिता की प्रावधानों के तहत नियंत्रण नहीं हो पा रहा है।

 

9. बांग्लादेशी अवैध घुसपैठिया बस्तर संभाग के सभी जिलों में निर्बाध रूप से रह रहे है। बांग्लादेशी अवैध घुसपैठियों के द्वारा यहां की प्राकृतिक संसाधन के साथ-साथ मानवीय संसाधनों पर भी अवैध हड़प तंत्र चला रहे है। इस मामले को लेकर समाज 5-6 सालों से लगातार आवाज उठाते आ रहा है लेकिन इस पर कोई भी कार्यवाही प्रशासन नहीं करती है हम आज भी इस पर मांग करते हैं कि अवैध घुसपैठियों की पूरी जांच करके उनको वापस भेजा जाए।

 

10. बस्तर संभाग में फर्जी जाति प्रमाण पत्रधारियों की संख्या दिनों दिन बढ़ती ही जा रही है इस विषय पर पूरा आदिवासी समाज चिंतित है। इस पर समाज व प्रशासन मिलके काम करें तभही इससे पार पाना संभव है। ऐसे कई फर्जी जाति प्रमाण पत्रधारियों को कभी कभी सभी तर का संरक्षण प्राप्त हुआ रहता है। जोकि एक विचारणीय पहलू है।

1. बस्तर का इतिहास गवाह रहा है जो भी सामाजिक कार्यकर्ता या जनप्रतिनिधि से आदिवासियों को जागरूक करने या आदिवासियों को उनके हक अधिकार की मांग करता है उसे किसी ना किसी तरह से दबाने या अन्य तरीके से किनारे का प्रयास सालों से होता रहा है। वर्तमान में इसी तरह से बस्तर संभाग के वरिष्ठ जनप्रतिनिधि आदिवासी समाज के प्रखर प्रणेता पूर्व मंत्री माननीय श्री कवासी लखमा जी को जिस तरह से गिरफ्तार करके जेल में रखा गया है कहीं ये बस्तर के आवाज को दबाने की कोशिश तो नहीं है? क्योंकि अपने मंत्रित्वकाल में संभाग के आदिवासी समुदाय के उत्थान के लिए मुखर होकर कार्य किये है। इनके प्रयास से सम्पूर्ण बस्तर संभाग में पेसा कानून अधिनियम एवं वन अधिकार अधिनियम के प्रति कार्यशालाओं का आयोजन कर आदिवासी समुदाय को अधिकारों के प्रति सजग एवं जागरूक लगातार किया जाता रहा है। इनके विशेष प्रयास से ही विशेष पिछडी जनजाति के बच्चों को एमबीबीएस में प्रवेश दिलवाया गया। इनके प्रयास से ही अन्दरूनी क्षेत्रों में बद स्कलों को पुनः संचालित किया जाने लगा। अपने शासन के विरोध में जाकर स्थानीय भर्ती के मुद्दे पर अपने ही सरकार से लड़ते रहे। आदिवासियों के अधिकारों के लिए अपने ही सरकार से जल जंगल और जमीन के लिए पूरे बस्तर संभाग के आदिवासी समुदाय के साथ खड़े दिखे। विधान सभा में आदिवासी हित के लिए हमेशा प्रखर रहे । ऐसे जनप्रतिनिधि या सामाजिक कार्यकर्ता का जेल में रहना कहीं ना कहीं समाज के लिए चिंता की बात है। बाकी निर्दोष या दोषी घोषित करना माननीय न्यायालय का अधिकार है।

 

हम सर्व आदिवासी समाज के मुखिया होने नाते शासन प्रशासन से इन मुद्दों पर साफ साफ़ बात करना चाहते हैं। बस्तर संभाग पांचवी अनुसूची में क्षेत्र में आता है अतः हम समस्त समाज प्रमुख चाहते है कि आदिवासी एवं पांचवी अनुसूची क्षेत्रों में सविधान प्रदत्त समस्त नियमों अधिनियमों का पालन हो जिससे आदिवासियों का रूढ़िगत रीति रिवाज, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत अक्षुण एवं शाश्वत बना रहे। इसी आशा और विश्वास के साथ ।

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