
10 फरवरी भूमकाल दिवस – भूमकाल आंदोलन 1910 में नारायणपुर क्षेत्र के योगदान पर विशेष लेख
जल, जंगल और जमीन के हक की लड़ाई ने आदिवासी वीरों के स्वाभिमान को जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्ष 1910 के कालखंड में समूचा बस्तर अंचल ब्रिटिश दासता से मुक्ति की आस में छटपटा रहा था।
लोक साहित्यकार एवं जनजातीय शोधकर्ता डॉ.भागेश्वर पात्र के अनुसार बस्तर राजपरिवार के सदस्यों की उपेक्षा एवं आदिवासियों के शोषण और अत्याचार ने भूमकाल जैसे महान क्रांतिकारी आंदोलन को जन्म दिया।
भूमकाल आंदोलन की प्रारंभिक रणनीतिक गुप्त बैठक ग्राम – ताड़ोकी, तहसील – अंतागढ़ जिला – कांकेर में स्थित दन्तेश्वरी मातागुड़ी में हुई थी। राजपरिवार के सदस्य लाल कालेन्द्र सिंह, राजमाता सुवर्ण कुमारी देवी (सुबरन कुंवर),वीर गुंडाधूर के साथ कोलर परगना के जमींदार चिन्तू हल्बा देहारी भी महान भूमकाल के सूत्रधारों में शामिल थे। शासकीय दस्तावेजों से इस तथ्य की पुष्टि होती है कि कोलर – ताड़ोकी क्षेत्र में चिन्तू हल्बा ने विद्रोह का नेतृत्व किया था।
फ़रवरी 1910 तक आंदोलन का विस्तार व्यापक स्तर पर हो चुका था। बस्तर के प्रायः सभी समुदाय ने इस आंदोलन में भाग लिया था। दक्षिण बस्तर के कुछ जमींदारी को छोड़कर समूचा बस्तर क्रांति की आग में झुलस रहा था। मार्च 1910 तक विद्रोह को कठोरता पूर्वक कुचला गया।
नारायणपुर जिलान्तर्गत अबुझमाड़,छोटेडोंगर एवं महाराष्ट्र राज्य के सीमावर्ती क्षेत्र आंदोलन के प्रभाव में थे। जनश्रुति के अनुसार नारायणपुर से धरमा पातर,बहीदार रामधर कुपाल एवं अन्य ने ताड़ोकी के गुप्त बैठक में भागीदारी की थी।
ब्रिटिश हुकूमत को वर्तमान नारायणपुर जिला के अबुझमाड़ क्षेत्र और छोटेडोंगर में भूमकाल क्रांति को दबाने में खासी मशक्कत करनी पड़ी थी। अबुझमाड़ का कुतुल और छोटेडोंगर विद्रोह के प्रमुख केन्द्र थे। छोटेडोंगर में विद्रोह का नेतृत्व आयतू माड़िया ने किया था।
भूमकाल आंदोलन लंबे समय तक आदिवासियों को संघर्ष के लिए प्रेरणा और ऊर्जा देने में विफल रहा लेकिन आदिवासी जननायकों के अदम्य साहस,कुशल नेतृत्व और वीरता ने राष्ट्रीय स्तर पर जनमानस को प्रभावित किया और स्वतंत्रता आंदोलन की भावी पृष्ठभूमि तैयार करने में प्रेरक का कार्य किया।